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बच्चों को अपने जीवन काल में इतनी डांट पडती हैकि वे बडों के द्वाराबात-बेबात पर् डांटे जाने को स्वाभाविक प्रक्रिया मांनते हैंऔर कभी बुरा लगने पर भी कमीज की बाहों से अपने आंसू पोछ लेते है अथवा सुबक –सुबक कर रो लेते है।पर क्या कभी हम बडों ने इस बात पर विचार किया हैकि हम अपने क्रोध को मासूम बच्चों पर उतारते है।बच्चॉं की गलती न होने पर भी वे हमारे क्रोध काकारंण बनते हैक्योंकि वे दुधमुहे होते है,क्योंकि उनकी कोइ अदालत नहीं होती,क्योंकि वे बेजुबां होते है,क्योंकि वे अभिभावकों के मोहताज होते है ,क्योंकि वे बच्चे होते हैं,क्योंकि अपने को अभिव्यक्त नहीं कर पाते,क्योंकि उनका कोइ वजूद नहीं होता,क्योंकि वे समर्थ नहीं होते। हम बडे कहे जाने वालेजीव् बच्चों को डांटते समय अपनी भाषा का ध्यान नहीं रख्ते-सुअर,, कुत्ता,गधा,पागल ,बैमान ,चोर ,उचक्का,लफंगा,हाथी की तरह खाता है,लड्की की तरह शरमाता है,लडके होकर रोते हो,तुम तो निरे बुद्धु हो, अकल तो है नही,बांकी तरह बढ रहे हो आदि-आदि।ये तो कुछ मिसाले हैंजिनका प्रयोग बहुतायत से किया जाता है।इसके अतिरिक्त गाली देना तो एक फैशन की तरह बन गया है।साला, साली को तो गाली माना ही नही जाता,बात-बात मे इस शबद को एक तकिया कलाम के रुप में प्रयोग किया जाता है।बिना सोचे समझे कि हमारे द्वारा कहे जाने वाले शब्द बच्चों के शब्द कोश में फीड् हो जाते हैंऔर बच्चे उन शब्दों को कहते समय बिल्कुल भी सजग नहीं होटल कि ह कुछ भी गलत कर रहे हैं। आओ हम प्रतिग्या करेंबच्चों को डाटने से पहले सोचेगे कि किस गलती पर डांटा जा रहा हैऔर हमकिस भाशा का प्रयोग कर रहे हैं।
ना जी, बच्चों को क्यों डाटा जाये... प्यार से समझाओ मान जायेगें..
ReplyDeleteबच्चों को डांटना-मारना उचित नहीं है।
ReplyDeleteकोई भाषा हो अगर हृदय में होगा प्यार।
ReplyDeleteबच्चे भूखे प्यार के सम्भव तभी सुधार।।
सादर
श्यामल सुमन
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