Sunday, July 11, 2010

क्या हुआ

क्या हुआ जो हमारे वे हो न सके
हम पर मर न सके हम से जी नसके ।

जब -जब हमने बुलाया वे आ न सके
हाल अपने दिल का सुना ना सके।

हमने सपने बुने और बुनते रहे
उनको अपना जहा हम दिखा ना सके।

हमने आंसू बहाये उन्ही के लिये
वे आंसू की माला बना ना सके।

हमने उनको चुना और वे समझे नही
हम उन्ही के ख्बावो मे डूबे रहे ।

इंतहा हो गई और वे आये नही
हमको पूछा नही और छूआ नही ।

पर हम उनके हुए और होते रहे
साथ उनका कभी भी मिला ही नही ।

अब हम भी चले उनसे सब तो कहा
पर वे समझे नही तो हम क्या करे।

Thursday, July 8, 2010

आंख क्यो भर आई है

कदम -कदम पर अपनो का दंश
व्यक्ति को किस कदर तोड देता है ।
ये अपने कहे जाने वाले
क्यो हर कदम पर केवल
अपना और अपना स्वार्थ ही देखते है।
अब कैसे कहे इन्हे हम अपना
और जब अपने है ही नही तो
क्यो ना अपना जगत अलग बनाये
जहा अकेले है तो क्या
निक्रष्ट स्वार्थ की गन्ध तो नही
जब पूरी वसुधा ही कुटुम्ब है
तो क्या अपने और क्या पराये
इन मानवो से अच्छे तो
वे शुक शावक है
जिन्हे हम पशु -पक्षी की
संज्ञा से नवाजते है।
कदम -कदम पर दुतकारते है ।
और वही देते है हमारा साथ अंत तक
जैसे सत्यवादी युधिष्ठर का
साथ दिया था श्वान ने
अरे मुझे तो ये पषु-पक्षी बहुत ही भाते है
कम सेकम बच्चो का सा
निर्मल हृदय तो रखते है ।

Monday, July 5, 2010

प्राथमिक शिक्षा ही पूरी शिक्षा व्यवस्था की नीव है।

बडे दुख का विषय है कि अभिभावक अपने पाल्यो की प्राथमिक शिक्षा के प्रति सतर्क नही है।इसे अक्षर ज्ञान के अतिरिक्त और कुछ नही माना जाता जबकि सारी इमारत इसी नीव पर आधारित होती है।किस कक्षा को पढाती हो ,क्या कहा पहली दूसरी को तब तो समखो तुम कुछ नही कर रही हो । तुम्हारे तो मजे ही मजे है ।बस अपना टाइम पास कर रही हो। इन तिप्पणियो को सुनते-सुनते तो मुझे भी इकबारगी यही लगने लगा कि बच्चो को अक्षर ज्ञान देना बहुत ही सरल कार्य है ।शायद यही कारण हो इ प्राथमिक शालाओ के अध्यापको को विशेष तरजीह नही दी जाती।उसे केवल पट्टी ,स्लेट अथवा कापी पर किटकिन्ना डालने वाला मान लिया गया । बहुत हुआ तो सामूहिक रूप से गिनती या पहाडे बुलबाने के लिये अधिक़्रत मान लिया गया।
जब मै अपने बी.एड. प्रशिक्षणार्थियो के साथ प्राथमिक और माध्य्मिक शालाओ मे गई तो कमोवेश मैने गुरुजी का यही रूप देखा ।कक्षा मे इक बच्चे को खडा कर दिया और वह सभी बवच्चो को सामूहइक अभ्तयास करवा रहा है और गुर्
ी

Wednesday, June 23, 2010

दीप सब अब बुझ गये है

आंख के आंसू सूख गये है
दीप अब सब बुझ गये है
हो गई है रात काली
चान्द भी अब छिप गया है
पैर मेरे थम गये है
चाल मद्धिम हो गई है

रहा न अब कोई उपाय
हो गये हम है हम निरुपाय

एक तेरा आसरा है
सहारा न दूसरा है
क्या अभी कुछ और् बाकी
जो मुझे ही देखना है
अब ना जो आये प्रभूजी
नाम तेरा बदनाम होगा
कुछ ना बिगडेगा हमारा
जो भी तेरा होगा

हम तो तेरे भक्तहै बस
और कुछ ना जानते है
अब जो होगा वो ही होगा
सोच जो तूने रखा है।

अब क्या करना हमको करना

जो भी करना तू ही करना

बस इसी मे है भलाई
मौन मन अब हो गया है।

Sunday, June 20, 2010

बहुत याद आते है पिताजी

पिता केवल जनक ही नही हुआ करते
हुआ करते है हमारा सम्बल
हमारे सन्स्कार
हमारी यादे
और सबसे अधिक हमारी शक्ति ।
बच्पन अप्ना रूप तभी
ले पाता है जब पिता
नन्ही अगुलियो को थामे
जीवन की पथरीली डगर
पर चलना सिखाता है
डगमगाते े कदमो को
स्थिरता देता है
और नीर-छीर विवेकी
बनाता है।
मा महिमा मंडित होजाती है
और पिता अपने पुरुष्त्व के
खोल मे सिला बधा
न तो बेटी की विदाई पर
खुल कर रो पाता है
और न अपने स्नेह का
इजहार ही कर् पाता है
पर इससे क्या
पिता छोटे
े तो नही हो जाते

बहुत याद आते है पिताजी

Wednesday, June 16, 2010

युग को कलियुग बना रहे

राम का युग त्रेता का युग था
कृष्ण का युग था द्वापर
युग को कलियुग बना रहे हम
गलत सोच अपनाकर।

नई बात नही , हर युग मे
नारी का शोषण होता है
आज भी सीता का देश निकाला
द्रोपदी का चीर हरण होता है।

लेकिन् सीता को सहारा देने
त्रेता मे वाल्मीकि आये थे
और मूकदर्शक बनी सभा से
दुर्योधन ने शाप ही पाये थे ।

अपमान झेलती आज नारी का
दुख कम करने कोई आता है?
तमाशा देखना पसन्द सभी को
मरहम कोई लगाता है?

सम्पत्ति के बटबारे पर
विवाद होता आया है
राम को यदि वनवास मिला तो
पान्ड्वो ने अज्ञातवास पाया है।

हक छिन जाने पर भी राम ने
वनवास सहर्ष स्वीकारा है
भरत ने भी भाई की खातिर
राज गद्दी को नकारा है।

युद्ध मे अपनो के आगे खडे
अर्जुन के हाथ डगमगाये थे
धर्म की रक्षा के लिये ही
धनुष पर वाण चढाये थे।

आज हर विवाद का हल
हिंसा से ही होता है
धर्म का भले ही नाम दे
जन क्रोध के वश मे होता है ।

सूरज वही चन्दा वही
वही आसमा के तारे है
जो कल था वह आज भी है
बस बदले विचार हमारे है।

हम कलियुग मे नही जी रहे
युग को कलियुग बना रहे
यह युग भी त्रेता बन जायेगा
निष्कपट अगर भावना रहे।


प्रिय वरुण के सौजन्य से