Saturday, August 14, 2010

ये आजादी क्या होती है दीदी

आज एक बच्ची के सवाल ने
कर दिया मुझे अनुत्तरित ।
जब सभी बच्चो ने
आजादी के तराने गाये
और कल के कार्यक्रम की
तैयारी मे वे ेउल्लसित
नज़र आये
े तब
कक्षा के बाहर झांकती
दो आंखो ने
बडी मासूमियत से
मुझ पर प्रश्न दागा ।
ए,दीदी मुझे भी बताओ ना
ये आजादी क्या होती है
भारत माता कैसी होती है
क्या वह भी मेरी मा की माफिक
दिन भर सिर पर
बोझा ढोती है ।
और क्या उसके बच्चे भी
मेरे जैसे फटेहाल घूमते है
क्या उसका नन्हा बेटा भी
भूख से े चीख -चीख कर
रोता है और बापू के
हाथो खूब पिटता है ।
क्या कल मेरी मा के
हाथो मे भी झंडा होगा
क्या कल मेरा शराबी बाप
हम बच्चो को नही पीटेगा
यदि ऐसा होगा तो यह आजादी
बहुत अच्छी मिठाई है
कल सेमै भी पढूगी
भारत माता की जय
और गन्धीजी अमर रहे
के नारो से प्रयास गुजादूंगी ।
अब बोलो न दीदी ये आजादी
रोज रोज क्यो नही आती ।

Sunday, August 8, 2010

सच की ताकत

हाँ सही पढ़ा आपने
सच बहुत ताकतवर
होता है |
पर इस सच को कह पाना
इस सच को सह पाना
इस सच को जी पाना
बेहद त्रासद अनुभव
हुआ करता है |
बेपेंदे के लोटे से स्वार्थी जन
जहां मतलब निकलता हो
जहां उनकी दाल् गलती हो
हवा के रुख से
बदलते हैं अपनी निष्ठाएं |
सच नितांत अकेला और
निरावरण हुआ करता है
सच आपके साहस की
हर पल परीक्षा लेता है|
कई बार तो सारे के सारे झूठ
अपने पूरे प्रलोभनों के साथ
आपको खींचने की पूरी
कोशिश शिद्दत से करते हैं|
इनसे बचने की झमेले में
हो जाते हैं लहूलुहान आप
ये सारे के सारे झूठे वजूद
आपको बुरी तरह तोड़ते है |
और फिर भी आप
नहीं छोड़ पाते सच का साथ
तब होता है सच विजयी
अपनी पूरी ताकत के साथ |
और आप अनायास कह उठट्रे हैं
सच में ताकत
सच की ताकत
हमें जीना सिखाती है
बार-बार हरबार |

Monday, August 2, 2010

ये कैसा प्रेम

एक व्यक्ति के चारों और का माहौल
बस प्यार और प्यार से आच्छादित
फ़िल्में देखता है तो बस प्यार से भरी
साहित्य पढ़ता है तो वही प्रेम की बातें
प्रेम कथाओं का इतना बड़ा समुन्दर
अखबार इन्हीं खबरों से लबरेज हैं
और हर पत्रिका का कवर पेज
किसी न किसी प्रेम में डूबी
नायिका के चित्र से सज्जित |

ऐसे माहौल में जिंदगी के बीस बरस बिता
जब हो जाता है प्यार
और लगने लगती है दुनिया रंगीन
परदे की बातें बनती है जीवन का सच
और जैसे ही शुरुआत होती है
उन लम्हों की जिन्हें जीवन का
सबसे खूबसूरत लम्हा कहा जाता है |

अचानक बदलने लगती है दुनिया
पता नहीं कहाँ गुम हो जाताहै
प्रेम का साहित्य,चुक जाते है विद्यापति
खो जाती हैं प्रेम कथाएं
और चारों और से होने लगता है
आक्रामक व्यंग्यों का हमला
अब बताया जाने लगता है उसे वासना
और न जाने क्या-क्या |

ये सब इतना जल्दी घटता हैकि
प्यार करने वाले समझ ही नहीं पाते
कि जो कल मूवी देखी थी
देवदास,हम आपके है कौन
और बहुत सी प्रेम में ें डूबी तहरीरें
क्या सब बकबास थी
तो क्यों रचा जा रहा था ऐसे बकबास
प्यार का माहौल
क्यों बनाई जा रही थी ऐसी
झूठी पिक्चरें और क्यों रच रहे थे
ऐसा साहित्य |

जबाब दिया जा रहा था
अरे वह तो बस देखने और
पढने के लिए था
ये सब सच थोड़े ही ना होता है
बस देखो पढ़ो और भूल जाओ |
अब तुम ही बताओ मेरे मित्र
कैसा है ये प्रेम |

Tuesday, July 27, 2010

सावन तो आयो है

फिर आया मनभावन सावन
याद आ गया बाबुल का आँगन
पीपल सरिस पे झूला डल गए
माजी की बांछे अब खिल गई |
आयेगी अब बिटिया रानी
घर भर में खुशिया दौडेंगी
साबन की मल्हारे गूंजेगी |
भैया जी मगन हो गए
बहना का अब लाड मिलेगा
बचपन फिर किलकारी लेगा |
सोच सोच कर सब ही खुश थे
पर ये कैसा सावन आया
बुंदिया बरसी मेहदी रच गई
पर प्यारी लाडो न आई |
अब आया था उसका मेल
मैया बापू दुखी हो गए
देख के बिटिया का येखेल |
सावन बावन क्या होता है
झूले तो अब बीत गए है
अब सब ये है बीती बातें |
अब तो मैं हूँ क्लब में जाती
हरे रंग की साडी पहने
हरियाली तीजे मनती है|
झूला ,पटली और मल्हारे
किसको अब अच्छी लगती है |
सावन आये भादों जाए
क्या मतलब अब इन बातों का
हमने तो इतना जाना है
तीन ही ऋतुएं होती है अब
जाड़ा ,गर्मी और बरसात |

Friday, July 23, 2010

प्राथमिक शिक्षा ही पूरी शिक्षा व्यवस्था की नींव है।

बडे दुख का विषय है कि अभिभावक अपने पाल्यों की प्राथमिक शिक्षा के प्रति सतर्क नहीं है।इसे अक्षर ज्ञान के अतिरिक्त और कुछ नहीं माना जाता जबकि सारी इमारत इसी नीव पर आधारित होती है।किस कक्षा को पढाती हो ,क्या कहा पहली दूसरी को तब तो समझो तुम कुछ नही कर रही हो । तुम्हारे तो मजे ही मजे है ।बस अपना टाइम पास किये जाओ । इन टिप्पणियों को सुनते-सुनते तो मुझे भी एकबारगी यही लगने लगा कि बच्चों को अक्षर ज्ञान देना बहुत ही सरल कार्य है ।शायद यही कारण हो इन प्राथमिक शालाओ के अध्यापको को विशेष तरजीह नहीं दी जाती।उसे केवल पट्टी ,स्लेट अथवा कापी पर किटकिन्ना डालने वाला मान लिया गया । बहुत हुआ तो सामूहिक रूप से गिनती या पहाडे बुलबाने के लिये अधिक्रत मान लिया गया।
जब मैं अपने बी.एड. प्रशिक्षणार्थियो के साथ प्राथमिक और माध्यमिक शालाओं मे गई तो कमोवेश मैंने गुरुजी का यही रूप देखा ।कक्षा मे एक बच्चे को खडा कर दिया और वह सभी बच्चों को सामूहिक अभ्यास करवा रहा है और गुरूजी अपने अन्य कार्य में व्यस्त हैं |बहुत हुआ तो एक डंडा उठाकर बच्चों पर फटकार दिया और चुप होने का निर्देश दे दिया |
जिस समय में बच्चे को गुरूजी का स्नेह ओर व्यक्तिगत निर्देशन चाहिए था ,वह कीमती समय केवल चुप बैठने में बीत गया | किसी तरह से पहली दूसरी तीसरी और अन्य कक्षाएं चढता गया पर न तो उसे शुद्ध लिखना आया और न पढना| और हम अध्यापक बस बच्चे में दोष देखते रहे |जब मैंने प्रयास में बच्चों को अक्षर ज्ञान देना प्रारम्भ किया ,तब पाया कि एक व्यक्ति ढेरों भूलें इसलिए करता है क्योंकि वह उसका सही रूप जानता तक नहीं |
मात्राओं का ज्ञान और संयुक्त वर्ण बनाना सिखाते समय यदि सावधानी बरती जाती तो आज ये त्रुटियाँ नहीं होती| जिस समय में मूल्योंका विकास किया जा सकता था ,वह समय बहुत बोझिल पाठ्यक्रम की भेंट चढ गया |हम अपने बच्चों को अंकों की अधिकता से ही नापते रहे और बच्चों के कंधे भारी बस्ते के बोझ तले दब कर झुकते चले गए|मासूम बचपन जो कहानियों का भूखा होता है पता नहीं बड़ी –बड़ी बातों को जानने में चूक गया| वह अपनी कोलोनी और अपने परिवेश से अपरिचित ही रह गया और हम उसे देश और विदेश के पाठ रटाते रहे| वह अपनी मात्रभाषा पर पकड़ नहीं बना पाया और हम उसे आर ए टी रेट और केट ही रटाते रहे |
जो समय उसे छोटे –छोटे गीत सिखाने का था उसमें हमने अश्लील और द्विअर्थी गानों पर ठुमकना सिखा दिया और इतराते रहे कि हमारा बालक आधुनिकता के सारे पैमानों पर खरा उतर रहा है |हमने उसे स्वतन्त्र व्यक्तित्व माना ही कब उसे लेकर हम अपने सपनों को पूरा करते रहे| उसकी क्या योग्यताएं है ,वह किस क्षेत्र में अपनी प्रतिभाओं का प्रदर्शन कर कुशल बन सकता था यह सब तो हमारे लिए बहुत गौण हो गया|हमने अपने स्तर को मेंटेन रखने के लिए सब कुछ तय कर लिया | हमने उस विद्यालय केवातावन को जानने की कोशिश भी नहीं की जहाँ हमारा लाडला दिन का एक महत्वपूर्ण समय बिताने जा रहा था |
क्या अपने पाल्य की शिक्षा –दीक्षा को लेकर हमें सजग नहीं हो जाना चाहिए ?बच्चे के घर लौटनेपर कितनी सारी बातें होती हैं जिन्हें वह अपने माता-पिता को बताना चाहता है ,क्या बच्चों का होमवर्क करवाना देना अथवा उसके लिए भी किसी ट्यूटर की व्यवस्था कर देना काफी है? क्या आपका बच्चा स्कूल से लौटकर यह नहीं चाहता कि आप उसका सर सहलाते हुए उससे बातें करें | यदि वह किसी दिन्स्कूल नहीं जाना चाहता तो उसकी भी कोई निशिचित वजह होती है| हो सकता है वह स्वयं अपने से परेशान हो आप उसकी सभी बातों को सुनने के लिए समय निकालें और उसकी परेशानियों पर ध्यान दें |
ये कुछ छोटी-छोटी बातें हैं जिनके प्रति अभिभावकों को सतर्क होना बहुत जरूरी
है|अपने बच्चों पर केवल पैसा खर्च कर ही हम माता- पिता के दायित्व से मुक्त नहीं हो सकते||

Wednesday, July 14, 2010

मेरी पाठशाला

नन्हे-नन्हे ये शिशु
अपनी तुतलाती भाषा में
जब कहते है
दीदी हम तो खेलेंगे
पढेंगे नहीं |
तब मैं अकसर सोचने पर विवश
हो जाती हूँ
क्या गलत कहते हैं
शुभम,शाहीन और सोनिया |
ये उम्र ही खिलंदड़ी की है
जब हम जबरन उन्हें अ से अनार और
आ से आम रटाते है
और वह बोलने के बजाय अनार और
आम खाने की फरमायश करते है |
ल से लट्टू सिखाने पर
लट्टू चलाने की जिद
तो प से पतंग उसे आकाश
में उडती नजर आती है \
रेट माने चूहा और
केट माने बिल्ली कहते ही
वे नन्हे -मुन्ने चूहें बिल्ली की
अपनी ढेर सारी बातें
मसलन दीदी बिल्ली सारा दूध पी गई
और चूहे ने मेरा कपड़ा
कुतर दिया |
बों बतराना चाहते है|
और कमाल है
इन की बातें कोई
नहीं सुनना चाहता |
सब बस उसे मारपीट कर
उसके छोटे से दिमाग में
सब कुछ भर और ठूस देना चाहते है|
तब समझ आया इन बच्चों की तो
एक बिलकुल निराली दुनिया है
जहा किताबे नहीं
केवल आपका स्नेह और ममत्व चाहिए|
फिर सीख तो वे यूं लेते है
कि बस ज़रा सा सहारा
भर लगा दीजिए |
सच कहूँ तो
मैं इन बाल-गोपालो को
नहीं सिखाती
बल्कि ये ही मिल कर मुझे
रोजाना एक नया सबक
सिखा देते हैं|