Tuesday, March 17, 2009

हम क्या कर सकते हैं

क्या हम इतने स्वाथी हो गये हैं कि अपने हित के अलावा कुछ सोच ही नही सकते?

क्या हमारा दायित्व केवल अपने परिवार के लिये ही है?

क्या उन हजारों बच्चो के लिये हमारी सम्वेदना समाप्त हो गयी है जिंनके ऊपर से माता पिता.का साया उठगया है अथवा जिनके अभिभावक उनके प्रति सजग नहीं हैं?

क्या हम इतने स्वाथी हो गये हैं कि अपने हित के अलावा कुछ सोच ही नही सकते?
क्या हमारा दायित्व केवल अपने परिवार के लिये ही है?
क्या उन हजारों बच्चो के लिये हमारी सम्वेदना समाप्त हो गयी है जिंनके ऊपर से माता पिता.का साया उठगया है अथवा जिनके अभिभावक उनके प्रति सजग नहीं हैं?
क्या जिन्दगी का मकसद केवल और केवल अपना पेट भरना है?
यदि ऐसा नहीं है तो हमें सोचना होगा कि हम क्या   क्या करें  जिससे अपनी यदि आपकी जिन्दगी को नया अर्थ मिल सके। 

यदि आपके पास कोई हुनर है तो उसे दूसरों को सिखायें।
अपने ज्ञान  को दूसरों के साथ बाँटें ।

दूसरों की समस्याओं को हल करने में अपना योगदान दें।
छोटी -छोटी सहायता कर के आप उनका दिल जीत सकते हैं।

आपके पास जो भी अतिरिक्त है उसे तत्काल दूसरों को दे दें।

अपनी आवश्यकताओं को सीमित करे। 

अपने ऊपर विश्वास रखें कि आप जो भी कर रहे हैं वह आपकी द्रष्टि से बिल्कुल ठीक है।








Saturday, March 14, 2009

Tuesday, February 24, 2009

अंधेरी दुनिया

शिक्षा बच्चों का पहला अधिकार है लेकिन बहुत दुख का विषय है कि ये बच्चे कम उमर में ही मजदूरी करते है। दरअसल उनके माता-पिता अपनी गरीबी के कारण उनसे मजदूरी कराना चाहते है।ऐसे बच्चो को शिक्षित करना एक पढे-लिखे नागरिक का पहला कर्तव्य है।
हमअपनी-अपनी दुनिया में इतने व्यस्त हैं कि इन छोटी –छोटी बातों पर ध्यान ही नहीं देते। आओ सोचें हम क्या कर सकते हैं?
1.अपनी दुनिया को थोड़ा बड़ा करें।
2.ऐसे बच्चों को इकठ्ठा करें ।
3.उनको पढ़ाना शुरु करें।
4.सबसे पहले सुन्दर वर्ण लिखना सिखाऍ।
5. छोटे-छोटे शब्द लिखना सिखाना जरुरी है।
6. अक्षर ज्ञान के साथ- साथ अंकीय ज्ञान देना भी आवश्यक है ।
7.नैतिक शिक्षा के लिये महापुरुषों से सम्बन्धित कहानिय़ॉ सुनाना आवश्यक है।
8.वैदिक मंत्र और प्रार्थना प्रतिदिन करानी चाहिये।
9. छोटी कविताओं को कंठ्स्थ करा देना चाहिये।
10.शारीरिक व्यायाम के साथ –साथ मांनसिक स्वास्थय के लिये ध्यान कराना पहली शर्त है।