सब कुछ वैसा ही
जैसा पहले हुआ करता था ।
बस मर गई है सम्वेदनाये
ठंडे पड्गये है अरमान
और बुझ से गये है चेहरे।
स्वार्थी लोगो के दोगले व्यक्तित्व
दुतरफा बाते ,पीठ मे धंसी कटारे
और मोथरी होती हमारी बाते
सब जेहन मे चित्र लिखित सा
ज्यो का त्यो अंकित है ।
जबकि करोडोपल गुजर चुके
टनो सांसो की आवाजाही
और सूरज भी निकला हर रोज ।
शिथिल और स्तम्भित् से हम
सब के साक्शी तो बने
पर कर ना पाये कुछ भी
बस यू ही मूढ से बैठे
दर्शक बने ताकते रहे
चित्रलिखित से बैठे रहे
और झेलते रहे अपने कहे
जाने वालेअपनो के
निर्मम प्रहारो को ।
Wednesday, November 16, 2011
Saturday, September 3, 2011
कहाँ हो मेरी माँ ?
हाँ माँ आज फिर वही सब आँखों के आगे घूम रहा है | आपकी डूबती साँसें और हमारा डाक्टरों से बार- बार आपको बचा लेने का पुरजोर आग्रह | और फिर एक साथ सब कुछ समाप्त हो गया | हम रोते रहे पर न आपको कुछ सुनना था और न ही हमें चुप कराना था| बस सब कुछ समाप्त और हम बच्चिया आपके कलेजे की टुकड़े मा और पिता के साये से मरहूम हो गए |
शायद हमारा और आपका इतना ही साथ लिखा होगा| अब यदि कुछ कहना भी चाहे तो किससे कहें ,अब हमारी माँ तो शेष नहीं और माँ का विकल्प कुछ नहीं होता| पर आपकी यादों से हम आज भी भरे पूरे हैं | आपने जितना दिया वही हमारा पाथेय है| हर संकट में आपकी शिक्षाएं ही हमारा मार्ग दर्शन करती हैं|और यह दुनिया तो आज भी वैसी ही निर्मम और कठोर ही है जैसी आपके सामने हुआ करती थी| अच्छा ही हुआ जो आपने हमें चरित्र की द्रढता दी | नैतिक मूल्यों का पाठ पढ़ाया वरन आज के स्वार्थ की आंधी में हम तो कब के फिसल गए होते | और सुनो माँ कल तक जो किनारा करते रहे आज बड़े हमदर्द बन कर सामने आये है पता नहीं ये सब बहुरूपिये हैं या उनके मन वाकई बदल गए हैं ?जिनको सदा हम अपना मानते रहे ,जिनके लिए अपना सब कुछ सोंप दिया आज वही नज़रे चुरा रहे हैं | कभी तो लगता है शायद हमारी पढाई सैद्धांतिक ज्यादा हो गयी और हम दुनियादारी से अन्जान रह गए | पिताजी कहते थे कि बेटा खूब पढ़ो और आगे बढ़ो | आज पिताजी होते तो जरूर पूछती पिताजी इस दिनिया में पढाई भी कई किस्म की होती है हमने जो पढ़ा और उसे जीवन में उतारने लगे तो लगा दुनिया में कोइ बहुत बड़ा तूफ़ान आगया| शायद गांधीजी को पढाना तो ठीक था पर उनके आदर्शों पर चाकर तो सभी दुश्मन हो गए लगते हैं | पर माँ जब से अन्ना की जीत हुई मुझे फिर लगाने लगा कि मेरे माता अपनी जगह ठीक थे और उनहोंने हमें जो दिया उसके सहारे भी जन्दगी बिताई जा सकती है| पिताजी तो यही कहते बेटा राम और्क्रश्ना की बाते करती हो तो उनके जितने कष्ट सहने की हिम्मत भी पैदा करो|
माँ वैसे तो सब ठीक है और सभी अपनी परिस्थितियों में सहज बने हिउए हैं | बस कभी कभी बहुत मन होता है कि एक बार आप और पिताजी आजाते तो अपने मन की सभी बातें कह सुन लेती\ जब भी जन्म मिले आप ही मेरे माता-पिता के रूप में हो |
शायद हमारा और आपका इतना ही साथ लिखा होगा| अब यदि कुछ कहना भी चाहे तो किससे कहें ,अब हमारी माँ तो शेष नहीं और माँ का विकल्प कुछ नहीं होता| पर आपकी यादों से हम आज भी भरे पूरे हैं | आपने जितना दिया वही हमारा पाथेय है| हर संकट में आपकी शिक्षाएं ही हमारा मार्ग दर्शन करती हैं|और यह दुनिया तो आज भी वैसी ही निर्मम और कठोर ही है जैसी आपके सामने हुआ करती थी| अच्छा ही हुआ जो आपने हमें चरित्र की द्रढता दी | नैतिक मूल्यों का पाठ पढ़ाया वरन आज के स्वार्थ की आंधी में हम तो कब के फिसल गए होते | और सुनो माँ कल तक जो किनारा करते रहे आज बड़े हमदर्द बन कर सामने आये है पता नहीं ये सब बहुरूपिये हैं या उनके मन वाकई बदल गए हैं ?जिनको सदा हम अपना मानते रहे ,जिनके लिए अपना सब कुछ सोंप दिया आज वही नज़रे चुरा रहे हैं | कभी तो लगता है शायद हमारी पढाई सैद्धांतिक ज्यादा हो गयी और हम दुनियादारी से अन्जान रह गए | पिताजी कहते थे कि बेटा खूब पढ़ो और आगे बढ़ो | आज पिताजी होते तो जरूर पूछती पिताजी इस दिनिया में पढाई भी कई किस्म की होती है हमने जो पढ़ा और उसे जीवन में उतारने लगे तो लगा दुनिया में कोइ बहुत बड़ा तूफ़ान आगया| शायद गांधीजी को पढाना तो ठीक था पर उनके आदर्शों पर चाकर तो सभी दुश्मन हो गए लगते हैं | पर माँ जब से अन्ना की जीत हुई मुझे फिर लगाने लगा कि मेरे माता अपनी जगह ठीक थे और उनहोंने हमें जो दिया उसके सहारे भी जन्दगी बिताई जा सकती है| पिताजी तो यही कहते बेटा राम और्क्रश्ना की बाते करती हो तो उनके जितने कष्ट सहने की हिम्मत भी पैदा करो|
माँ वैसे तो सब ठीक है और सभी अपनी परिस्थितियों में सहज बने हिउए हैं | बस कभी कभी बहुत मन होता है कि एक बार आप और पिताजी आजाते तो अपने मन की सभी बातें कह सुन लेती\ जब भी जन्म मिले आप ही मेरे माता-पिता के रूप में हो |
Monday, June 13, 2011
आपका बच्चा कैसे खेल खेलता है ?
हम सभी अपने बच्चों की पढाई को लेकर बहुत चिंतित रहते हैं पर क्या कभी आपने गौर किया है कि आपका लाडला अपने बचपन में किस प्रकार के खेल खेलता है |ये आलेख लिखते -लिखते मुझे अपना बचपन याद आगया और मैंने वे सभी खेल यहाँ लिख दिए जो हम खेला करते थे| शायद आप भी बच्चों के लिए इसमें से कुछ चुन ले | वैसे तो आज के मॉडर्न युग में इतने बड़े-बड़े समर केम्प लगा दिए जाते हैं कि हम सभी अपने बच्चों को वहीं भेजने में अपना बडप्पन मानते हैं| पर अब भी कुछ खेल बाकी है जिनको खिलाकर हम अपने बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास कर सकते हैं |
1. पोसमपा भई पोसमपा
पोसम पा भई पोसम पा
डाकियो ने क्या किया
सौ रुपये की घड़ी चुराई
अब तो जेल में फंसना पडेगा
जेल की रोटी खानी पड़ेगी
जेल का पानी पीना पडेगा
अब तो जेल में रहना पडेगा|
2. तितली तितली रंग दे |
कैसा
मन चाहे जैसा
लाल
बच्चे लाल रंग की वस्तुओ को छूकर बताएँगे |
ऐसे ही सब रंगों का नाम लेकर बच्चों को रंगों की जानकारी देंगे |
३. सभी बच्चे छोटा गोला बनाकर घूमेंगे|
एक बच्चा बाबा बनेगा |
सभी बच्चे उससे पूछेंगे|
बाबा बाबा कहाँ जारहे
गंगा नहाने
गंगा तो ये रही
ये तो छोटी है
एक पैसा डाल दो
बडी हो जाएगी |
(बाबा बना बालक उसमें पैसा डालेगा और बच्चे गोले को बड़ा कर लेंगे|) आओ मिलकर गंगा नहाएं |
४. बच्चे अपनी मुठ्ठी एक दूसरे की मुठ्ठी के ऊपर रख लेंगे|
(बच्चे गायेंगे )
बाबा बाबा आम दो
( एक कहेगा )
आम है सरकार के
(सभी बच्चे )
हम भी हैं दरबार के
(पहला बच्चा कहेगा)
एक आम उठा लो
( सभीबच्चे आम उठा कर)
ये तो खट्टा है
दूसरा उठा लो
मीठा है मीठा है
मेरा आम मीठा है |
५. पक्षियों का नाम लेकर कहेंगे तोता उड़ ,चिड़िया उड़|
बीच –बीच में जानवरों का नाम लेकर कहेंगे- गाय उड़,कुत्ता उड़ | यदि बच्चा जानवर के नाम पर भी अपनी अंगुली उठा देता है तो वह खेल से निकल जायेगा|
६, सभी बच्चे अपना अपना हाथ जमीन पर रख लेंगे | एक बच्चा सभी के हाथों को छूता हुआ गाना गायेगा
अटकन बटकन दही चटकन वन फूले बंगाले
मामा लायो सात कटोरी एक कटोरी फूटी
मामा की बहू रूठी
काहे बात पे रूठी खाने को बहुतेरो
दूध दही बहुतेरो |
राजा के भयो लड़का
बिछा दे रानी पलका
अंतिम शब्द जिसके हाथ पर आएगा वह खेल में निकल जाएगा ऐसे करके सबसे बाद में जो बच्चा रह जाएगा सभी लोग उसके हाथों पर चपत मारेंगे उसे अपना हाथ बचाना होगा | इसी प्रकार खेल खेला जाएगा |
७. इन खेलों के अतिरिक्त गेंद के खेल (सेका सिकाई ,गिट्टी फोड ,सात टप्पे) ऊँच-नीच ,किल किल कांटे,नीली पीली साड़ी ,खो-खो ,रस्सी कूद ,गुटके ,स्टापू (जमीन पर आकृति बनाकर उसके खानों में गोटी डालना )अन्त्याक्षरी ,संज्ञा शब्द खेल (नाम-व्यक्ति, वस्तु, शहर,जानवर,पिक्चर )पर्ची खेल ( राजा, वजीर, चोर, सिपाही )छूहा छाही ,विष अमृत ,गुड़िया-गुड्डे के खेल ,केरम,साँप -सीढ़ी,लूडो ,पतंग,गुल्ली डंडा, कंचे गोली अवश्य खिलाए जाए | ये खेल बच्चों के शरीर को स्वस्थ रखते हैं साथ ही उनकी मानसिक क्षमता में वृद्धि भी करते हैं|बच्चे अनुकरण से सीखते हैं | कई बार वे अपने खेलों का निर्माण खुद कर लेते हैं जैसे डाक्टर बनकर सुईं लगाना और दवाई देना , टीचर बनकर बच्चों को पढ़ाना ,माता पिता बनकर उनके जैसा व्यवहार करना ये सभी खेल बच्चे स्वयं निर्मित करते हैं और अपने को अभिव्यक्त करते हैं |अपने बच्चों के बचपन के खेल देखकर हमें उनकी रूचि पता लगती है | कुछ बच्चों को कला बनाना बहुत पसंद है तो कुछ बच्चे अपने बेग में अपना खजाना रखते हैं मसलन चूड़ी के कुछ टुकड़े, कुछ तस्वीरें, कुछ कंचे कुछ टूटी पेंसिलें जो माता पिता और टीचर की निगाह में कूड़ा हो सकती हैं पर बच्चे को अपना ये खजाना बहुत प्रिय होता है बल्कि कहें कि वे इसे अपना राज्य मानते हैं और हम बड़े उस बच्चे के उस बेशकीमती खजाने को कूड़ा समझ कर फेंक देते हैं|मैंने भी कई बार ये गलती की कि जब बच्चों का बेग देखती थी तब उनकी बेशकीमती चीजों को बड़ी निर्ममता से फेंक दे देती थी| इस बार प्रयास के एक बच्चे ने बड़ी मासूमियत से कहा दीदी क्या आपको पता है कि जो सामान आपने फेंक दिया वह मैं ने कितनी मुश्किल से ओदा था | सच ही हमें बच्चों के प्रति अपना नजरिया बदलना होगा | अब इतना ही | शेष अगली पोस्ट में
1. पोसमपा भई पोसमपा
पोसम पा भई पोसम पा
डाकियो ने क्या किया
सौ रुपये की घड़ी चुराई
अब तो जेल में फंसना पडेगा
जेल की रोटी खानी पड़ेगी
जेल का पानी पीना पडेगा
अब तो जेल में रहना पडेगा|
2. तितली तितली रंग दे |
कैसा
मन चाहे जैसा
लाल
बच्चे लाल रंग की वस्तुओ को छूकर बताएँगे |
ऐसे ही सब रंगों का नाम लेकर बच्चों को रंगों की जानकारी देंगे |
३. सभी बच्चे छोटा गोला बनाकर घूमेंगे|
एक बच्चा बाबा बनेगा |
सभी बच्चे उससे पूछेंगे|
बाबा बाबा कहाँ जारहे
गंगा नहाने
गंगा तो ये रही
ये तो छोटी है
एक पैसा डाल दो
बडी हो जाएगी |
(बाबा बना बालक उसमें पैसा डालेगा और बच्चे गोले को बड़ा कर लेंगे|) आओ मिलकर गंगा नहाएं |
४. बच्चे अपनी मुठ्ठी एक दूसरे की मुठ्ठी के ऊपर रख लेंगे|
(बच्चे गायेंगे )
बाबा बाबा आम दो
( एक कहेगा )
आम है सरकार के
(सभी बच्चे )
हम भी हैं दरबार के
(पहला बच्चा कहेगा)
एक आम उठा लो
( सभीबच्चे आम उठा कर)
ये तो खट्टा है
दूसरा उठा लो
मीठा है मीठा है
मेरा आम मीठा है |
५. पक्षियों का नाम लेकर कहेंगे तोता उड़ ,चिड़िया उड़|
बीच –बीच में जानवरों का नाम लेकर कहेंगे- गाय उड़,कुत्ता उड़ | यदि बच्चा जानवर के नाम पर भी अपनी अंगुली उठा देता है तो वह खेल से निकल जायेगा|
६, सभी बच्चे अपना अपना हाथ जमीन पर रख लेंगे | एक बच्चा सभी के हाथों को छूता हुआ गाना गायेगा
अटकन बटकन दही चटकन वन फूले बंगाले
मामा लायो सात कटोरी एक कटोरी फूटी
मामा की बहू रूठी
काहे बात पे रूठी खाने को बहुतेरो
दूध दही बहुतेरो |
राजा के भयो लड़का
बिछा दे रानी पलका
अंतिम शब्द जिसके हाथ पर आएगा वह खेल में निकल जाएगा ऐसे करके सबसे बाद में जो बच्चा रह जाएगा सभी लोग उसके हाथों पर चपत मारेंगे उसे अपना हाथ बचाना होगा | इसी प्रकार खेल खेला जाएगा |
७. इन खेलों के अतिरिक्त गेंद के खेल (सेका सिकाई ,गिट्टी फोड ,सात टप्पे) ऊँच-नीच ,किल किल कांटे,नीली पीली साड़ी ,खो-खो ,रस्सी कूद ,गुटके ,स्टापू (जमीन पर आकृति बनाकर उसके खानों में गोटी डालना )अन्त्याक्षरी ,संज्ञा शब्द खेल (नाम-व्यक्ति, वस्तु, शहर,जानवर,पिक्चर )पर्ची खेल ( राजा, वजीर, चोर, सिपाही )छूहा छाही ,विष अमृत ,गुड़िया-गुड्डे के खेल ,केरम,साँप -सीढ़ी,लूडो ,पतंग,गुल्ली डंडा, कंचे गोली अवश्य खिलाए जाए | ये खेल बच्चों के शरीर को स्वस्थ रखते हैं साथ ही उनकी मानसिक क्षमता में वृद्धि भी करते हैं|बच्चे अनुकरण से सीखते हैं | कई बार वे अपने खेलों का निर्माण खुद कर लेते हैं जैसे डाक्टर बनकर सुईं लगाना और दवाई देना , टीचर बनकर बच्चों को पढ़ाना ,माता पिता बनकर उनके जैसा व्यवहार करना ये सभी खेल बच्चे स्वयं निर्मित करते हैं और अपने को अभिव्यक्त करते हैं |अपने बच्चों के बचपन के खेल देखकर हमें उनकी रूचि पता लगती है | कुछ बच्चों को कला बनाना बहुत पसंद है तो कुछ बच्चे अपने बेग में अपना खजाना रखते हैं मसलन चूड़ी के कुछ टुकड़े, कुछ तस्वीरें, कुछ कंचे कुछ टूटी पेंसिलें जो माता पिता और टीचर की निगाह में कूड़ा हो सकती हैं पर बच्चे को अपना ये खजाना बहुत प्रिय होता है बल्कि कहें कि वे इसे अपना राज्य मानते हैं और हम बड़े उस बच्चे के उस बेशकीमती खजाने को कूड़ा समझ कर फेंक देते हैं|मैंने भी कई बार ये गलती की कि जब बच्चों का बेग देखती थी तब उनकी बेशकीमती चीजों को बड़ी निर्ममता से फेंक दे देती थी| इस बार प्रयास के एक बच्चे ने बड़ी मासूमियत से कहा दीदी क्या आपको पता है कि जो सामान आपने फेंक दिया वह मैं ने कितनी मुश्किल से ओदा था | सच ही हमें बच्चों के प्रति अपना नजरिया बदलना होगा | अब इतना ही | शेष अगली पोस्ट में
Sunday, May 8, 2011
मैं और माँ
हाँ माँ न जाने मुझे बार-बार यही लगता है कि मैं आप जैसी माँ नहीं बन पाई | पता नहीं कहाँ चूक हुई और कैसे हुई मुझे अहसास तक नहीं हुआ और अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत| आपने कभी हमें मारा नहीं पर आपकी डाट ही हमारे लिए बहुत बड़ी सजा होती थी| आज जब बच्चे अपने- अपने दायित्व की दुनिया में सिमट गये हैं तो लगता है जैसे हमारा कोना खाली होगया| पर माँ मुझे तो आधी उम्र पार कर लेने पर भी हर समस्या को सुलझाने में आप ही याद आती हो| हम तो पाँच बहिने थे किस कुशलता से आपने घर को सम्भाला इसका अहसास तो आज होता है जब दो बच्चों की परवरिश में भी चूक हो जाती है | अब समझ आता है आप की तीसरी निगाह हमेशा हमारी पीठ पर क्यों टिकी रहती थी| मम्मी शायद आज के बच्चे ज्यादा व्यावहारिक हो गये हैं| वे अपना भलाबुरा हमसे अच्छी तरह जानते होंगे|कितनी तो बातें है जो आपसे शेयर करना चाहती हूँ | और रिश्तों की दुनिया तो इतनी तेजी से बदली है कि स्नेंगी तो आप भी अचरज में पड़ जायेंगी| जो कल तक सीधे मुँह बात नहीं करते थे आज वे बादल झमाझम बरस रहे हैं| शायद उस लोक में आपको कुछ शक्तियां जरूर मिली हैं |कभी कभी तो रिश्तों का ये व्याकरण मुझे समझ नहीं आता तो छोटी से पूछती हूँ | कब छतीस तिरेसठ हो जाए कोई नहीं जानता| मुझे ध्यान आता है आप कहा करतीथी नवन नीच की अति दुखदाई तो अब मै सतर्क तो हूँ |
और सुनाओ माँ, वहाँ की दुनिया कैसी हैं, क्या वहाँ भी छल कपट और गन्दगी है या सभी लोग चैन की वंशी बजाते हैं |
क्या कहा ,सब कुछ ऐसा ही है जैसा यहाँ था | अरे माँ ऐसा तो होना ही था | वहाँ भी तो ये ही पड़ौसी बसते होंगे जो यहाँ थे| तो फिर कहीं चले जाओ अपनी अकल से ही काम लेना पडता है|लोग तो कहते हैं आज की माँ सुपर मोम बन गई है पर मुझे लगता है वह एक अच्छी कार्यकत्री तो जरूर हो गई है पर वात्स्ल्ट का वितरण सही तरह से नहीं कर पा रही है| यदि हमारे बच्चे गलत रास्ता पकडे तो क्या हम उन्हें रोकेंगे नहीं पर आज तो यह सिस्टम ही खतम हो गया है कहा जाने लगा है बच्चे हमसे अधिक समझदार है वे अपना भला बुरा सब समझते हैं |क्या माता पिताआउट डेटेड हो गये हैं | तो चलो ऐसा ही सही हमने तो अपनी जिम्मेदारी निभादी अब उनकी बारी है और माँ ए माँ तो यही चाहती है न कि उसके बच्चे जहां रहे खुश रहे तो माँ मैंने भी यही धीरज धार लिया है कि हमारा क्या .जैसे इतनी कलात गई शेस भी काट जायेगी|पर अपने स्वार्थ के लिए बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड तो नहीं कर सकते| आखर हम माँ जो ठहरे| हमेशा बदली परिस्थितियों से समझौता बिठा ही लेते हैं |
माँ दिवस पर तुम्हें ढेरों शुभकामनाएं |
जब तक आप ज़िंदा थी हम जानते ही नहीं थे कि माँ दिवस भी होता है हमारे लिए तो हर दिन की शुरुआत ही माँ से होती थी और जब आप आज यादों के पटल पर हो ये दिन मुझे बहुत याद आता है| है|
और सुनाओ माँ, वहाँ की दुनिया कैसी हैं, क्या वहाँ भी छल कपट और गन्दगी है या सभी लोग चैन की वंशी बजाते हैं |
क्या कहा ,सब कुछ ऐसा ही है जैसा यहाँ था | अरे माँ ऐसा तो होना ही था | वहाँ भी तो ये ही पड़ौसी बसते होंगे जो यहाँ थे| तो फिर कहीं चले जाओ अपनी अकल से ही काम लेना पडता है|लोग तो कहते हैं आज की माँ सुपर मोम बन गई है पर मुझे लगता है वह एक अच्छी कार्यकत्री तो जरूर हो गई है पर वात्स्ल्ट का वितरण सही तरह से नहीं कर पा रही है| यदि हमारे बच्चे गलत रास्ता पकडे तो क्या हम उन्हें रोकेंगे नहीं पर आज तो यह सिस्टम ही खतम हो गया है कहा जाने लगा है बच्चे हमसे अधिक समझदार है वे अपना भला बुरा सब समझते हैं |क्या माता पिताआउट डेटेड हो गये हैं | तो चलो ऐसा ही सही हमने तो अपनी जिम्मेदारी निभादी अब उनकी बारी है और माँ ए माँ तो यही चाहती है न कि उसके बच्चे जहां रहे खुश रहे तो माँ मैंने भी यही धीरज धार लिया है कि हमारा क्या .जैसे इतनी कलात गई शेस भी काट जायेगी|पर अपने स्वार्थ के लिए बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड तो नहीं कर सकते| आखर हम माँ जो ठहरे| हमेशा बदली परिस्थितियों से समझौता बिठा ही लेते हैं |
माँ दिवस पर तुम्हें ढेरों शुभकामनाएं |
जब तक आप ज़िंदा थी हम जानते ही नहीं थे कि माँ दिवस भी होता है हमारे लिए तो हर दिन की शुरुआत ही माँ से होती थी और जब आप आज यादों के पटल पर हो ये दिन मुझे बहुत याद आता है| है|
Sunday, April 24, 2011
प्रत्यावर्तन
बदलती घटनाओं से
कभी चमत्कृत होती
तो कभी संशय में आजाती हूँ|
दरअसल घटनाएँ जिस रूप में
मोड लेरही हैं आजकल
उसे क्या नाम दूं |
बरसों के भटके रिश्ते
बड़ी आत्मीयता जता रहे हैं
और वे नाते जिन्हें
इतने यत्नों से पाला पोषा
आज नज़रों से ओझल
होते जा रहे है|
मानो अब उनका टर्म
समाप्त होरहा हो |
आदतन सहज विशवास
कर ही लेती हूँ
बड़ी से बड़ी घटना पर|
पर रिश्तों का ये प्रत्यावर्तन
मुझे उलझन में
उलझा रहा है |
और मै अवश सी सब कुछ
ऐसे स्वीकारती हूँ
मानो ये सब नियति का हिस्सा है |
औरमुझे अब ये ही रोल अदा
करना है |
कभी चमत्कृत होती
तो कभी संशय में आजाती हूँ|
दरअसल घटनाएँ जिस रूप में
मोड लेरही हैं आजकल
उसे क्या नाम दूं |
बरसों के भटके रिश्ते
बड़ी आत्मीयता जता रहे हैं
और वे नाते जिन्हें
इतने यत्नों से पाला पोषा
आज नज़रों से ओझल
होते जा रहे है|
मानो अब उनका टर्म
समाप्त होरहा हो |
आदतन सहज विशवास
कर ही लेती हूँ
बड़ी से बड़ी घटना पर|
पर रिश्तों का ये प्रत्यावर्तन
मुझे उलझन में
उलझा रहा है |
और मै अवश सी सब कुछ
ऐसे स्वीकारती हूँ
मानो ये सब नियति का हिस्सा है |
औरमुझे अब ये ही रोल अदा
करना है |
Thursday, April 14, 2011
कब तक पुकारू ?
ये कैसी कठिन परीक्षा
मेरे प्रभु
मैं तो पुकार- पुकार
कर थक चुकी
पर तुम न आये |
मेरा विश्वास
अभी भी
जस का तस है
कि
प्रभु सच्चे मन
की पुकार सुनते तो जरुर होंगे|
पर अब तो गले से बोल भी नहीं फूटते
मैं शांत,अविचल और निश्चिंत
आज भी तेरी ही
राह तकती हूँ
क्या पता न जाने
कब और कहाँ से तेरा
आगमन हो
और मुरझाई बेल
फिर से पल्लवित हो जी उठे|
मेरे प्रभु
मैं तो पुकार- पुकार
कर थक चुकी
पर तुम न आये |
मेरा विश्वास
अभी भी
जस का तस है
कि
प्रभु सच्चे मन
की पुकार सुनते तो जरुर होंगे|
पर अब तो गले से बोल भी नहीं फूटते
मैं शांत,अविचल और निश्चिंत
आज भी तेरी ही
राह तकती हूँ
क्या पता न जाने
कब और कहाँ से तेरा
आगमन हो
और मुरझाई बेल
फिर से पल्लवित हो जी उठे|
Friday, April 1, 2011
हम कौन खेत की मूली है ?
रुकावटें नहीं हटतीं तो न हटें
सफलताएं नही मिलतीं तो न मिलें
अपने पराए होते हों तो होते रहें
खजाने खाली होते हों तो हुआ करें
दोस्त मुँह फेरते हो तो फेरते रहें
मुझे सच में कुछ भी बुरा नहीं लगता |
बस मेरा विश्वास
मेरी मान्यताएं
मेरे संस्कार
मेरी लेखनी
मेरा उत्साह
मेरे आदर्श
मेरा सकारात्मक सोच
कहीं भी और किसी भी परिस्थिति में
मेरा दामन न छोड़े|
चलती रहूँ सत्यपथ पर
न सूखे मेरी ममता का स्रोत|
और कम से कम हिम्मत
तो जबाव न दे
तो देखना ये छोटी छोटी बाधाएं
ये गहराते से संकट
ये लम्बी चुप्पी
ये दोगली सामाजिकता
ये दोहरे व्यक्तित्व
भला क्या बिगाड़ पायेंगे
सिवाय इसके कि स्वयं ही
अडिग पत्थरों से
टकरा- टकरा कर
खुद अपना अस्तित्व खो दें|
और सच ,
गर्वोन्नत सच
अपनी तेजोमय गरिमा के साथ
अपनी धारदार प्रखरता के बल पर
फिर से प्रतिष्ठित
होगा इस भूतल पर |
धैर्य तो रखो बंधु
ज़रा विश्वास तो रखो|
जब राम ,मर्यादा पुरुषोत्तम राम
अकारण ही चौदह वर्ष
का वनवास झेलते हैं |
और पांडव वन-वन मारे फिरते हैं
योगीराज कृष्ण के जन्म से पूर्व
ही कंस क्रूर बन जाता है|
विवेकानंद और दयानंद भी
नहीं बखसे जाते तो
भला हम कौन
खेत की मूली है ?
सफलताएं नही मिलतीं तो न मिलें
अपने पराए होते हों तो होते रहें
खजाने खाली होते हों तो हुआ करें
दोस्त मुँह फेरते हो तो फेरते रहें
मुझे सच में कुछ भी बुरा नहीं लगता |
बस मेरा विश्वास
मेरी मान्यताएं
मेरे संस्कार
मेरी लेखनी
मेरा उत्साह
मेरे आदर्श
मेरा सकारात्मक सोच
कहीं भी और किसी भी परिस्थिति में
मेरा दामन न छोड़े|
चलती रहूँ सत्यपथ पर
न सूखे मेरी ममता का स्रोत|
और कम से कम हिम्मत
तो जबाव न दे
तो देखना ये छोटी छोटी बाधाएं
ये गहराते से संकट
ये लम्बी चुप्पी
ये दोगली सामाजिकता
ये दोहरे व्यक्तित्व
भला क्या बिगाड़ पायेंगे
सिवाय इसके कि स्वयं ही
अडिग पत्थरों से
टकरा- टकरा कर
खुद अपना अस्तित्व खो दें|
और सच ,
गर्वोन्नत सच
अपनी तेजोमय गरिमा के साथ
अपनी धारदार प्रखरता के बल पर
फिर से प्रतिष्ठित
होगा इस भूतल पर |
धैर्य तो रखो बंधु
ज़रा विश्वास तो रखो|
जब राम ,मर्यादा पुरुषोत्तम राम
अकारण ही चौदह वर्ष
का वनवास झेलते हैं |
और पांडव वन-वन मारे फिरते हैं
योगीराज कृष्ण के जन्म से पूर्व
ही कंस क्रूर बन जाता है|
विवेकानंद और दयानंद भी
नहीं बखसे जाते तो
भला हम कौन
खेत की मूली है ?
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