कहां गये वे खेल खिलौने ? समय बदलने के साथ सब कुछ बदल गया।छुपा_छुपाई,आइस-पाइस,किलकिल कांटे,सातटप्पे बाला गेंद का खेल,गिट्टीफोड, चोर् -सिपाही,अटकन-बटकन दही चटाके-वन फूले बंगाले,बाबा बाबा आम दो,बाबा बाबा कहां जारहे गंगा नहाने,गुटके खेलना,इमली के चीयों से चक्खन पे खेलना,जमीन पर आक्रति बना उसमेंगोटी डाल इक्कम दुक्कम खेलना,सहेलियोंकेसाथ रस्सी कूदना,पेड्पर रस्सी डाल झूला झूलना,मां का पुराने कपडों से सुन्दर सी गुडिया बना देनाऔर सहेली के गुड्डे से उसका ब्याह रचाना,मोहल्ले मेंहाथोमेंपेड की टहनी पकड बारात निकालना,गुदिया की शादी मेंढेर सारेझूठ-मूठ के पकवान बनानाआदि-आदि। मुझे तो अपना वह समय आज भी याद है जब होली के मेले मेंमिट्टी के खिलौनों के लिये हमारी पहली फरमायश् होती थी,रंग बिरंगे गुब्बारों पर हमारी ललचाती निगाहें टिकी रहतीथीऔर जब तक वे गुबारे हमारे हाथों की शोभा नही बन जाते थे हम बच्चोका रूठना मटकना बरकरार रहता था।
पुरानी आदत वश जब मेले में जाकर मैंगुब्बारे और मिट्टी के खिलौने खरीदने लगी,संसथा में बच्चो के लिये कपडे की गुडिया बनाने लगी ,मिट्टी के खिलौने बनबाने लगी तोमुझे पहली टिप्प्णी कुछ इस रूप में मिली क्या इस जमाने में भी पचास सालो को वापिस लाने की कोशिश कर रही हो,समय के साथ कदम मिला कर चलो बाजार में सब कुछ मिलता हैक्यों खुद को और बच्चों को परेशान कर रही हो।मुझे लगता है हम अपने आलस को छुपाने के लिये नये जमाने का तर्क गढ़् लेते हैं
आज जब बच्चों के खेल और खिलौनौ की बात आती है तो सारे केसारे विध्वंसात्मक खिलोने हमने उनके हाथ में पकडा दिये है6कहींढिसुम-ढिसुम करती बन्दूके है तो कहीं भयंकर आवाजेंकरती गाडियोंऔर हेलीकोप्टरों के मोडल है।खेल के नाम पर या तो वीडियोगेम है अथवाहाथों में रिमोट लिये कार्टूनों को देखतेऔर एक ही स्थान पर बैठे जादुई प्रभाव में बन्धे बच्चे।शारीरिक व्यायाम के नाम पर हम उन्हें दो कदम भी नहीं चलने देते।क्या यही आधुनिकता है जिसके चलते हम अपने बच्चों को अपंग बना रहे हैं आज हम केवल उसके बौद्धिक विकास में ही अपनी पूरी शक्ति झोंक रहे हैऔर उसे भी एक रिमोट के रूप में तैयार कर रहे रहे है।उन खिलौनों और खेलों से बच्चों का जितना शारीरिक और मानसिक विकास होता था कहां गये वे खेल-खिलौने?