कब से तो बाट जोह रहे थे तेरी होली कि तू जल्दी से आजा| कितने रंग है जो तेरी प्रतीक्षा में सूखे जा रहे है|अरे साल भर का त्यौहार होता है बर्षों से सुनते आरहे है कि कमसेकम आज केदिन तो सब पुरानी दुशम नी भुला कर गले मिलजाना चाहिएऔर गाना भी गाते है कि दुश्मन भी गले मिल जाते है और फिर एक और रसिया के बोल कान में पड़ते हैं आज ब्रज में होली में रसिया| सारे के सारे टी वी चेनल दिन रात होली के रंगारंग प्रोग्रामों से अटे पड़े है |जो वास्ताविक हो ली नहीं खेल पारहे वे अपनी हाईटेक की आभासी दुनिया में मस्त है| बाजार भी भरे पूरे है| मतलब होली अपने पूरे आगाज के साथ आई है| कल होलिका दहन पर पूरी कोलोनी वाले इकठ्ठे तो हुए |सबने मिलबांटकर प्रसाद भी खाया और आज सुबह भी पार्कमें दूसरों पर गुलाल अबीर चन्दन लगाते लगा कि बस सब आपसी वैरभाव भुलादिए गए है बस अब तो रामराज्य आया ही समझो | मन खुश हो गया चलो इतने सालो बाद ही सही अब होलीहोली सी तो लगी पर ये सब तो मैं सपना देख रही थी |नीद टूटी तो देखा तो सब रोज जैसा ही था |थोड़ी देर के लिए सबने मुखौटे पहन लिए थे| सब हंसने और खुश होने का नाटक कररहे थे |दरअसल ये लोग गले नहीं मिल रहे थे बस औपचारिकता पूरी कर रहे थे और बहने वे तो दस कदम आगे थी |एक दूसरे के मुँह से तीसरे की बातें की जा रही थी| कोई इस से ही संतुष्ट था कि चलो अब कम सेकम मिल तो रहे है |धीरे -धीरे सब ठीक हो जाएगा| इस पूरे आयोजन में एक ऐसा व्यक्ति भी थी जो मिस्टर मखीजा के यहाँ किराए पर आया था |उसने अभी-अभी अपना गाँव छोड़ा था और उसके मन में अपना अतीत हिलोरे मार रहा था | जब हम तथाकथित कहे जाने वाले सभी लोग अपने होलीमिलन समारोह में मस्त् थे तो वह्सज्जन बहुत गंभीरता से हमारेव्यवाहार को नोट कर रहा था | अभी कुछ देर पहले ही त्रिपाठी उठ कर गया है और कुछ ऐसे सवाल मेरी बैठक में छोड़ गया है जिनके उत्तर मैं खोज रही हूँ |बिट बीन द लायन जो उसने अनुभव किया उसी के शब्दों में रख रही हूँ -दीदी क्या आपको ऐसा नहीं लगा कि सब लोग एक डिस्टेंस मेंटेन कर रहे थे?आपस में सौहार्द नहीं था और कोई किसी के गले तो मिला ही नहीं |बस माथे पर गुलाल लगाकर औपचारिकता पूरी कर ली गई| न कोई हंसा न किसी ने ठिठोली कि और सभी यह कहते हुए अपने -अपने घरों में चले गए कि टीवी पर कार्यक्रम आरहा होगा| किसी को मेच देखाना था तोकिसी को अपने मन पसंद सीरियल छूट जाने का भय सता रहाथा | न तो आप लोगो ने कोई होली गाई और नहीं आपसी संवाद हुए| आपके यहाँ ऐसे ही होती है होली| इसी को कहते है आप होली मिलन समारोह|उससे अच्छा तो मुझे आपके यहाँ बैठकर लगा जहां आपने और सर ने होली से जुड़े इतने सारे तथ्य तो उजागर किए | दीदी जो हम पांच के मध्य आज हुआ कल पचास के बीच क्यों नहीं घट पाया | यदि सारे बुजुर्ग नई जनरेशन को होली का औचित्य समझा पाते तो आज के ये नन्हे मुनन्ने कम से कम अपनी संस्कृति से परिचित तो हो पाते | जब मैंने धीरे से अपनी बात रखी भी तो सभी ने उसे हंसी में उड़ा दिया- अरे त्रिपाठी ये सब तो टीवी सीरियलों से बच्चे जान ही लेते हैं |फिर गूगल सर्च करके सब जान जाते है |रही बात होलीगाने की तो सब सीडी में मिलता है| इस सबसे तुम इतने परेशान क्यों हो| दुनिया को दुनिया की तरह लेना सीखो|
सच ही कह गया वह नवागत कि जब सब कुछ रेडीमेड मिलने लग गया है तो हमारे बच्चे भी हमें रेडीमेड व्यवहार देने लगे तो न तो हमें व्यथित होना चाहिए और न हीं हमें अपसंस्कृति का रोना रोना चाहिए|
Sunday, March 20, 2011
Tuesday, March 8, 2011
क्या आज ही महिला दिवस है ?
आप कहते हैं तो मान लेते हैं कि आज ८ मार्च है और यह दिन हम महिलाओं के नाम समर्पित है पर लगता तो नहीं कि महिलाओं का भी कोई दिवस होता है| वही हर रोज जैसी सुबह है, दिन भी कमोवेश वैसा ही बीत जाएगा और रात उसे तो बीतना ही होता है | आज मेरी सेविका ने पूछा कि दीदी आज क्या त्यौहार है? बेटी कह रही है कि माँ आज तो अखबार में लिखा है कि महिला दिवस है | क्या आज मेरा मर्द मुझे दारू पीकर नहीं पीटेगा और क्या आज मुझे काम से भी छुट्टी मिलेगी| कम से कम एक दिन तो हमें भी आराम का मिलना ही चाहिए| हमारा भी तो मन होता है कि बरस दो बरस में कभी अपने मन का करें | क्यों क्या तुम रोज दूसरे की मर्जी से जीती हो |अब उसका मुँह खुल ही गया- अरे जब से माँ की कोख में आए हैं तब ही से हमें खतम करने की पूरी की पूरी साजिश रची गई पर शायद तब मोड़ा मोडी की जांच के साधन नहीं होते होंगे तभी तो मैं इस संसार में आ गई| पली, बड़ी पर सब कुछ चुपचाप होता रहा न मन में कोई उल्लास था और न कोई उमंग| अभी दस साल की भी नहीं हुई कि अम्मा को मेरे ब्याह की चिंता लग गई| हमेशा यही सुनाती रही तू तो पराये घर की अमानत है| जितनी जल्दी अपने घर पहुँच जाए तो हम गंगा नहाले |बापू को भी हमेशा यही कहते सुना तेरे हाथ पीले कर दू तो चिंता दूर हो जाए| मै तो जब से जन्मी माँ बाप के लिए चिंता ही बनी रही| ये १४ सालके होंगे और मैं १२ बरस की तब मुझे घर से विदा कर दिया गया| ससुराल पहुँच कर सोचा अब तो अपने घर आगई | पर भेद तो बाद में खुला कि ये घर भी मेरा नहीं था यहाँ भी सास कहती रही अरे पराये घर से आई है | चार पांच बालक हो गए मर्द की कमाई से घरखर्च पूरा नहीं होता तो खुद भी काम ढूढ़ लिया पर अभी तक कुछ भी नहीं बदला | अब लडके कहते है कि लडकियों को पढाने लिखाने की क्या जरूरत है जल्दी जल्दी लड़का देख कर ब्याह दें अपने घर जाए क्या जरूरत है पढाने लिखाने की बस चूल्हा चौका का काम सिखा दे | अभी तक तो मैं अपने कारण ही परेशान थी पर अब बेटियों का दुःख खाए जाता है | सभी मर्द एक जैसे ही होते हैं कौन सा लड़ाका देखू सबको इक ही बात सिखाई गई है कि औरत तो पैर की जूती है बस दान्त्मार कर काबू में रखो हाथ से निकल नी नहीं चाहिए ज्यादा खिलाने पिलाने की कोई जरूरत नहीं मोटी होगी तो ब्याह में परेशानी | दीदी अब आप ही बताओ कि मैं किस दिन को महिला का दिन समझू ये आप बड़े लोगों के चोंचले होते होंगे हमारे लिए तो जैसी ८मार्च वैसे ही और दिन |
मैं समझ नहीं पा रही कि कि मैं उसे क्या जबाब दूं | किन प्रगतियों को गिनाऊ और कौन से झूठे आश्वासन दूं बस इतना ही कह पाई देख जब तेरी बिटिया पढ़ लिख लेगी तब तुझे इन बातों के अर्थ समझ आयेंगे| किताबोंमें सब लिखा होता हैकि क्या सच है और क्या झूठ | उसको तो मैंने विदा कर दिया |\,पर मैं अपने मन को ही नहीं समझा पारही कि क्या वाकई महिला दिवस पर हम कुछ विशेष हो जाते हैं |यदि शिक्षा ही हमारे अंदर बदलाब लापाती तो आज भी आम औरत को घरेलू हिंसा का शिकार क्यों होना पढ़ता? क्यों लग्भ्स्ग रोज ही मासूम बच्चियां बलात्कार की शिकार होती और न ही यह समाज अपनी आधी आबादी के साथ इतना अमानवीय हो पाटा / प्रश्नोंके उत्तर तो मेरे भी पास नहीं हैं पर मैं इन प्रश्नों से स्वयं को बहुत ही घिरा महसूस कर रही हूँ ? हो सकता है आप मेरी कुछ सहायता कर सकें मेरे इन सवालों का यह अर्थ कतई नहीं है कि हम महिला दिवस पर खुश न हो और नकारात्मक सोंचें पर हम यह विचार अवश्य करें कि आखिर यह आधा अधूरा ज्ञान हमें कहाँ ले जारहा है?
मैं समझ नहीं पा रही कि कि मैं उसे क्या जबाब दूं | किन प्रगतियों को गिनाऊ और कौन से झूठे आश्वासन दूं बस इतना ही कह पाई देख जब तेरी बिटिया पढ़ लिख लेगी तब तुझे इन बातों के अर्थ समझ आयेंगे| किताबोंमें सब लिखा होता हैकि क्या सच है और क्या झूठ | उसको तो मैंने विदा कर दिया |\,पर मैं अपने मन को ही नहीं समझा पारही कि क्या वाकई महिला दिवस पर हम कुछ विशेष हो जाते हैं |यदि शिक्षा ही हमारे अंदर बदलाब लापाती तो आज भी आम औरत को घरेलू हिंसा का शिकार क्यों होना पढ़ता? क्यों लग्भ्स्ग रोज ही मासूम बच्चियां बलात्कार की शिकार होती और न ही यह समाज अपनी आधी आबादी के साथ इतना अमानवीय हो पाटा / प्रश्नोंके उत्तर तो मेरे भी पास नहीं हैं पर मैं इन प्रश्नों से स्वयं को बहुत ही घिरा महसूस कर रही हूँ ? हो सकता है आप मेरी कुछ सहायता कर सकें मेरे इन सवालों का यह अर्थ कतई नहीं है कि हम महिला दिवस पर खुश न हो और नकारात्मक सोंचें पर हम यह विचार अवश्य करें कि आखिर यह आधा अधूरा ज्ञान हमें कहाँ ले जारहा है?
Friday, February 25, 2011
अध्यापक शिक्षा और मूल्य बोध
अध्यापक शिक्षा और मूल्य बोध
जे. कृष्णमूर्ति के शब्दों में –"जानकारी इकठ्ठा करना और तथ्यों को बटोरकर आपस में मिलाना ही शिक्षा नहीं है,शिक्षा तो जीवन के अभिप्राय को उसकी समग्रता में देखना-समझना है|-----पूर्णत: समन्वित प्रज्ञाशील मनुष्य तैयार करना है|परीक्षा और उपाधि प्रज्ञा का मानदंड नहीं है|"उक्त सन्दर्भ
उक्त सन्दर्भ में आज की शिक्षा हमें बौद्धिक और सूचना-संपन्न भले ही बना रही हो परन्तु यह भी सच है कि हमने संवेदना की कीमत पर बुद्धि का विकास किया है|शिक्षा देने का काम शिक्षक का है और एक सच्चे शिक्षक के लिए अध्यापन तकनीक नहीं ,वह उसकी जीवनपद्धति है |क्या हमने कभी उन कारणों को तलाशने की कोशिश की है जिनके कारण शिक्षा मूलभूत शैक्षिक मूल्यों की अपेक्षा से दूर होती जा रही है ?निश्चित रूप से हमने बहुत सी पुस्तकें पढ़ी हैं ,उन सूचनाओं को याद भी कर लिया है ,परीक्षाएं भी पास कर ली हैं ,हमारे पास बहुत सारी उपाधियां भी हैं और इन उपाधियों ने हमें जीविका के साधन भी उपलब्ध करा दिए हैं|इसका अर्थ है यदि शिक्षा रोजगार के लिए थी ,तो हम निश्चित रूप से सफल हुए हैं| पर यह भी उतना ही सच है कि आज हम मशीन तो हुए हैं पर मनुष्यता कहीं बहुत पीछे छूट गई है|हमारी संवेदना दिन-प्रतिदिन मरती जा रही है|हमारे पास भौतिक सम्रद्धि तो अपार है पर हमारी संस्कृति ,हमारे मूल्य ,हमारे आपसी सम्बन्ध ,हमारी जड़े खोखली होती जा रही हैं और आज का सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही है |
शिक्षा देने का कार्य मुख्य रूप से शिक्षक का है | शिक्षक एक निश्चित पाठ्यक्रम और निश्चित शिक्षण विधि के अनुसार एक सिस्टम में बंधकर अपना कार्य करता है||उसे केवल उतना करना है जितना उसके लिए निर्धारित है||वह उड़ाका.गोताखोर अथवा तैराक के रूप में अपना कार्य करता है जबकि आज की परिस्थिति में उसे स्वयं को रूई धुनने बाला धुनिया और कुम्हार के रूप में प्रस्तुत करना होगा|दर असल मूल्य शिक्षा केवल किताबों का विषय हो ही नहीं हो सकती, उसे तो व्यवहार में दिखना चाहिए|समय का मूल्य सिखाने के दो उपाय हो सकते हैं |पहला आप छात्र को यह वाक्य याद करने को देंदे और दस पांच बार लिखवा लें और दूसरा उपाय है आप स्वयम दैनिक जीवन में इस आचरण का पालन करें |
केवल नोट्स और मोडल पेपरों से काम ना चलायें,मूल ग्रंथों का अध्ययन करें|
इंटरेक्टिव मेथोडोलोजी को अपनाएँ |हम मूल्यों को संप्रेषित करने के लिए पहले स्वयं तो संवेदित हो|बदलते परिवेश में मूल्यों की निश्चित दिशा तो तय करें|अब परिवेश में भौतिक संसाधन ही तो बदले हैं ,उनके साथ हम मूल्यों को कैसे नकार सकते है?वैसे भी शाश्वत मूल्य तो कभी नहीं बदला करते,हाँ,उस तक पहुँचने के साधन और कर्मकांड जरूर बदल जाते हैं|
यदि हम चरित्र और व्यक्तित्व को स्थान ही नहीं देते ,तो प्रत्येक स्तर पर हमें इतने चरित्रों के अध्ययन की क्या आवश्यकता थी?किसी भी परिस्थिति में हमारा द्रष्टिकोण
और निर्णय बहुत मायने रखते हैं|शिक्षा जीवन को दिशा देने के लिए होती है,उसे भटकाव में छोड़ने के लिए नहीं|
इन विषम परिस्थितियों में भी हम असमर्थताओं में नहीं ,भरपूर संभावनाओं में घिरे हैं|ईमानदारी,बहादुरी,सत्य,दया,सहानुभूति,परदुख कातरता ,क्षमा ,अस्तेय ,क्या इन मूल्यों की वर्तमान में आवश्यकता नहीं बची है,क्या ये मूल्य अपने अर्थ खोते जा रहे हैं?मेरा विचार है नहीं,आज भी इन शाश्वत मूल्यों का महत्त्व कम नहीं हुआ है|यदि ऐसा होता तो शिक्षा जगत के लिए तारें जमीन पर, थ्री इडियट , और मुन्ना भाई की फ़िल्में इतनी सामयिक ना होती|अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा आयोग जिसके अध्यक्ष जाक डेलर्स थे ,ने अपनी रिपोर्ट ज्ञान का खजाना में स्पष्ट रूप से संकेत दिया है कि जीवन भर चलने
वाली शिक्षा मुख्य रूप से चार स्तंभों पर टिकी होती है-१.जानने के लिए ज्ञान २.करने के लिए ज्ञान ३.साथ रहने के लिए ज्ञान और४.होने (अस्तित्व ) के लिए ज्ञान |
शिक्षा का उद्देश्य निश्चित ही रोजगार स्रजन है पर शिक्षा हमें बेहतर मनुष्य भी बनाए जिसमें मानवीय गुण हों तथा विश्व को बेहतर ढंग से रहने वाली जगह बनाए|यदि ह्रदय सच्चा है तो चरित्र होगा|चरित्र के साथ घर में शान्ति होगी और जहां घर अच्छे हैं ,उससे राष्ट्र और विश्व प्रभावित होगा|
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Posted by beena at 3:59 PM
जे. कृष्णमूर्ति के शब्दों में –"जानकारी इकठ्ठा करना और तथ्यों को बटोरकर आपस में मिलाना ही शिक्षा नहीं है,शिक्षा तो जीवन के अभिप्राय को उसकी समग्रता में देखना-समझना है|-----पूर्णत: समन्वित प्रज्ञाशील मनुष्य तैयार करना है|परीक्षा और उपाधि प्रज्ञा का मानदंड नहीं है|"उक्त सन्दर्भ
उक्त सन्दर्भ में आज की शिक्षा हमें बौद्धिक और सूचना-संपन्न भले ही बना रही हो परन्तु यह भी सच है कि हमने संवेदना की कीमत पर बुद्धि का विकास किया है|शिक्षा देने का काम शिक्षक का है और एक सच्चे शिक्षक के लिए अध्यापन तकनीक नहीं ,वह उसकी जीवनपद्धति है |क्या हमने कभी उन कारणों को तलाशने की कोशिश की है जिनके कारण शिक्षा मूलभूत शैक्षिक मूल्यों की अपेक्षा से दूर होती जा रही है ?निश्चित रूप से हमने बहुत सी पुस्तकें पढ़ी हैं ,उन सूचनाओं को याद भी कर लिया है ,परीक्षाएं भी पास कर ली हैं ,हमारे पास बहुत सारी उपाधियां भी हैं और इन उपाधियों ने हमें जीविका के साधन भी उपलब्ध करा दिए हैं|इसका अर्थ है यदि शिक्षा रोजगार के लिए थी ,तो हम निश्चित रूप से सफल हुए हैं| पर यह भी उतना ही सच है कि आज हम मशीन तो हुए हैं पर मनुष्यता कहीं बहुत पीछे छूट गई है|हमारी संवेदना दिन-प्रतिदिन मरती जा रही है|हमारे पास भौतिक सम्रद्धि तो अपार है पर हमारी संस्कृति ,हमारे मूल्य ,हमारे आपसी सम्बन्ध ,हमारी जड़े खोखली होती जा रही हैं और आज का सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही है |
शिक्षा देने का कार्य मुख्य रूप से शिक्षक का है | शिक्षक एक निश्चित पाठ्यक्रम और निश्चित शिक्षण विधि के अनुसार एक सिस्टम में बंधकर अपना कार्य करता है||उसे केवल उतना करना है जितना उसके लिए निर्धारित है||वह उड़ाका.गोताखोर अथवा तैराक के रूप में अपना कार्य करता है जबकि आज की परिस्थिति में उसे स्वयं को रूई धुनने बाला धुनिया और कुम्हार के रूप में प्रस्तुत करना होगा|दर असल मूल्य शिक्षा केवल किताबों का विषय हो ही नहीं हो सकती, उसे तो व्यवहार में दिखना चाहिए|समय का मूल्य सिखाने के दो उपाय हो सकते हैं |पहला आप छात्र को यह वाक्य याद करने को देंदे और दस पांच बार लिखवा लें और दूसरा उपाय है आप स्वयम दैनिक जीवन में इस आचरण का पालन करें |
केवल नोट्स और मोडल पेपरों से काम ना चलायें,मूल ग्रंथों का अध्ययन करें|
इंटरेक्टिव मेथोडोलोजी को अपनाएँ |हम मूल्यों को संप्रेषित करने के लिए पहले स्वयं तो संवेदित हो|बदलते परिवेश में मूल्यों की निश्चित दिशा तो तय करें|अब परिवेश में भौतिक संसाधन ही तो बदले हैं ,उनके साथ हम मूल्यों को कैसे नकार सकते है?वैसे भी शाश्वत मूल्य तो कभी नहीं बदला करते,हाँ,उस तक पहुँचने के साधन और कर्मकांड जरूर बदल जाते हैं|
यदि हम चरित्र और व्यक्तित्व को स्थान ही नहीं देते ,तो प्रत्येक स्तर पर हमें इतने चरित्रों के अध्ययन की क्या आवश्यकता थी?किसी भी परिस्थिति में हमारा द्रष्टिकोण
और निर्णय बहुत मायने रखते हैं|शिक्षा जीवन को दिशा देने के लिए होती है,उसे भटकाव में छोड़ने के लिए नहीं|
इन विषम परिस्थितियों में भी हम असमर्थताओं में नहीं ,भरपूर संभावनाओं में घिरे हैं|ईमानदारी,बहादुरी,सत्य,दया,सहानुभूति,परदुख कातरता ,क्षमा ,अस्तेय ,क्या इन मूल्यों की वर्तमान में आवश्यकता नहीं बची है,क्या ये मूल्य अपने अर्थ खोते जा रहे हैं?मेरा विचार है नहीं,आज भी इन शाश्वत मूल्यों का महत्त्व कम नहीं हुआ है|यदि ऐसा होता तो शिक्षा जगत के लिए तारें जमीन पर, थ्री इडियट , और मुन्ना भाई की फ़िल्में इतनी सामयिक ना होती|अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा आयोग जिसके अध्यक्ष जाक डेलर्स थे ,ने अपनी रिपोर्ट ज्ञान का खजाना में स्पष्ट रूप से संकेत दिया है कि जीवन भर चलने
वाली शिक्षा मुख्य रूप से चार स्तंभों पर टिकी होती है-१.जानने के लिए ज्ञान २.करने के लिए ज्ञान ३.साथ रहने के लिए ज्ञान और४.होने (अस्तित्व ) के लिए ज्ञान |
शिक्षा का उद्देश्य निश्चित ही रोजगार स्रजन है पर शिक्षा हमें बेहतर मनुष्य भी बनाए जिसमें मानवीय गुण हों तथा विश्व को बेहतर ढंग से रहने वाली जगह बनाए|यदि ह्रदय सच्चा है तो चरित्र होगा|चरित्र के साथ घर में शान्ति होगी और जहां घर अच्छे हैं ,उससे राष्ट्र और विश्व प्रभावित होगा|
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Posted by beena at 3:59 PM
Tuesday, February 22, 2011
हमें जाना कहाँ है ?
अरे भाई ,जब किसी वाहन में बैठते हो तब भी कंडक्टर पूछता है टिकिट कहाँ का काट दूं और आप झट से अपना गंतव्य, अपनी मंजिल बता देते हैं तो फिर इस जीवन के लिए आपने कोई मंजिल निश्चित ही तय की होगी ,आपको अपने लक्ष्य भी बहुत स्पष्ट होंगे और आप सही रूट की बस भी पकड़ना चाह रहे होंगे |पर यह इतना आसान कहाँ है? आज तो स्थिति यह है कि बनना कुछ चाहते हैं पर पढाई किसी ओर दिशा में कर रहे हैं| कभी कम्प्यूटर ,तो कभी मीडिया ,कभी साहित्य में हाथ आजमा ते हैं तो कभी दुकान खोल लेते हैं | कभी हम टीवी कलाकार बनाना चाहते हैं तो कभी डांसर, कभी गायकी में हाथ आजमा लेते हैं तो कभी- कभी लेखन भी शुरू कर देते हैं | आज के विद्यार्थियों से बातें करते हुए मुझे ऐसे अनुभव अक्सर हो रहे हैं | उनको यह नहीं पता होता कि हमें अपने जीवन में क्या करना है ,अपनी कोई रूचियाँ नहीं, बस बदलती दुनिया के साथ रोज रंग बदल लेते हैं | कभी एम.बी.ए जैसी उच्च शिक्षा पाने के बाद फिर सोचते हैं चलो अब आई.ए.एस. की तैयारी कर लेते हैं| कभी लगता है कि स्नातक परास्नातक तो बेकार की बातें हैं, चलो अब कोई प्रोफेसनल कोर्स कर लेते हैं फिर सोचाते है इसमें तो अच्छी कमाई नहीं चलो अब किसी ओर में हाथ आजमा लेते हैं | यानी कि हम आधी जिंदगी तक तो यही निश्चित नहीं कर पाते कि आखिर हमें करना क्या हैं|
बस हमारे सामने एक भीड़ है ,बहुमत जिधर चला जाता है उधर ही हम भ्रमित जाते हैं | हम कभी यह समझ ही नहीं पाते कि प्रत्येक व्यक्ति की अपनी प्राथमिकताएं हुआ करती हैं और उसे अपनी पारिवारिक परिस्थितियों के अनुकूल निर्णय लेने होते है| कोई जरूरी नहीं कि जो कार्य दूसरे के लिए लाभ का सौदा हो वह हमारे लिए भी हो | हमारी अपनी रूचिया, हमारा अपना परिवेश, हमारे अपने सरोकार बहुत मायने रखते हैं फिर दुनिया में कोई भी कार्य छोटा या बड़ा, अच्छा या बुरा नहीं हुआ करता| बुरा हुआ करती है हमारी नीयत, हमारा सोच, हमारे अपने कथन, हमारी अपनी विचार धाराए | आप जब भी किसी काम को अपने हाथ में लें पूरे मनोयोग के साथ और रूचि के साथ उसे पूर्ण करें सफलता अवश्य मिलेगी |
हम बहुत सारे कार्य अपने हाथ में ले लेते हैं -कुछ में हमारी रूचि नहीं होती कुछ दुनिया दिखावे और स्तर कोबनाये रखने के लिए जरूरी होता है और कुछ यूं ही बेमन से कर लिया जाता है| पर याद रखें सफल हम वहीं होते हैं जहां अपनी पूरी ताकत लगा देते हैं ,जो हमारी रूचि का काम होता है,जिसको करते हुए हम बोर नहीं होते ,जिसे करते हुए हमें आनंद आता है,समय यूं ही बीत जाता है और हमें पता भी नहीं चलता|
दुनिया के सारे काम .सारे रास्ते हमारे लिए खुले हैं |बस हम सबसे पहले अपनी प्राथमिकताए तो तय करें| हम अपने मन को जाने तो सही ,हम अपने विचारों को मान तो दें |हम अपने अस्तित्व को प्रमाणित तो करें |हम वही करें जो वास्तव में करना चाहते हों | हमें खुशी भी मिलेगी और हम अपने लक्ष्य में सफल भी अवश्य होंगे|
बस हमारे सामने एक भीड़ है ,बहुमत जिधर चला जाता है उधर ही हम भ्रमित जाते हैं | हम कभी यह समझ ही नहीं पाते कि प्रत्येक व्यक्ति की अपनी प्राथमिकताएं हुआ करती हैं और उसे अपनी पारिवारिक परिस्थितियों के अनुकूल निर्णय लेने होते है| कोई जरूरी नहीं कि जो कार्य दूसरे के लिए लाभ का सौदा हो वह हमारे लिए भी हो | हमारी अपनी रूचिया, हमारा अपना परिवेश, हमारे अपने सरोकार बहुत मायने रखते हैं फिर दुनिया में कोई भी कार्य छोटा या बड़ा, अच्छा या बुरा नहीं हुआ करता| बुरा हुआ करती है हमारी नीयत, हमारा सोच, हमारे अपने कथन, हमारी अपनी विचार धाराए | आप जब भी किसी काम को अपने हाथ में लें पूरे मनोयोग के साथ और रूचि के साथ उसे पूर्ण करें सफलता अवश्य मिलेगी |
हम बहुत सारे कार्य अपने हाथ में ले लेते हैं -कुछ में हमारी रूचि नहीं होती कुछ दुनिया दिखावे और स्तर कोबनाये रखने के लिए जरूरी होता है और कुछ यूं ही बेमन से कर लिया जाता है| पर याद रखें सफल हम वहीं होते हैं जहां अपनी पूरी ताकत लगा देते हैं ,जो हमारी रूचि का काम होता है,जिसको करते हुए हम बोर नहीं होते ,जिसे करते हुए हमें आनंद आता है,समय यूं ही बीत जाता है और हमें पता भी नहीं चलता|
दुनिया के सारे काम .सारे रास्ते हमारे लिए खुले हैं |बस हम सबसे पहले अपनी प्राथमिकताए तो तय करें| हम अपने मन को जाने तो सही ,हम अपने विचारों को मान तो दें |हम अपने अस्तित्व को प्रमाणित तो करें |हम वही करें जो वास्तव में करना चाहते हों | हमें खुशी भी मिलेगी और हम अपने लक्ष्य में सफल भी अवश्य होंगे|
Monday, February 21, 2011
वह बूढ़ा नीम और मेरे बाबा जी
कुछ यात्राएँअचानक ही विस्मरणीय बन पडती है| कल ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ| मेरे चचेरे भाई के बेटे की सगाई का अवसर था | मैं और मेरी मेरी बहिन वहां पहुँच गए | वैसे भी हम दोनों ऐसे किसी भी अवसर को नहीं छोडते जहां हमारे अपने लोगों से मिलानाजुलना होताहो| | सब कार्यक्रम की चमक दमक में खोए हुए थे | मैंने भाई से कहा- भैया क्या हम अपना पुराना घर देख सकते हैं ?मुझे सपने में भी विशवास नहीं था कि भाई इतनी जल्दी मेरे इस प्रस्ताब को मान लेंगे | कुछ ही देर मैं हम उस अहाते में थे जहां मेरे पिता का बचपन बीता था और जहां मेरी माँ ब्याह कर आई थी\ वहाँ पहुंचते ही मुझे माँ की बताई छोटी-छोटी बातें बेहद याद आरही थी कि कैसे छत से गिरकर बाबा के प्राण छूटे थे और कैसे उस घर में चोरों के किस्से माँ ने हमें सुनाये थे|वह लिपा -पुता अहाता आज भी अपने गौरवशाली अतीत को बयान कर रहा था|
वहाँ दो भैंसे बंधी हुई थी और सालो पहले जैसा चित्रण माँ किया करती थी उसमें कोई भी बदलाब नहीं हुआ था | मैनें अपने बाबा को कभी नहीं देखा | मेरी बडी दीदी और भैया जब ५-६ साल के रहे होंगे तभी उनका देहावसान हो गया था| उस समय शायद फोटो खींचने का रिवाज नहीं होता होगा सो हमने बाबा को कभी चित्रों में में नहीं देखा था| बस बाबा जीवंत थे तो केवल माँ और पिता के द्वारा बताई गई घटनाओं में| उसी अहाते में एक बहुत- बहुत बूढ़ा नीम का पेड़ था| जब मैंने अपने ताऊ जी से पूछा कि क्या यह पेड़ पिताजी के समय भी था तो वहाँ खड़े एक बुजुर्ग बोले - लाली तेरे बाप के बाप यानी तेरे बाबा का लगाया हुआ पेड़ है यह | सच में मैं बहुत भावुक हो उठी और दोनों हाथों से कसकर उस बूढ़े पेड़ को पकड़ लिया और बाबा कहते हुए फफक उठी | किसी की समझ में नहीं आरहा था कि आखिर मुझे हो क्या गया है | मैं बीना जिसने कभी अपने बाबा को देखा तक नहीं ऐसा क्यों कर रही हूँपर सच बताऊँ न जाने मुझे ऐसा क्यों लगा कि मेरे बाबा अपनी पोती को सूखे पत्ते गिराकर आशीर्वाद दे रहे हों | वो स्पंदन मेरा पीछा आज भी नहीं छोड़ रहा | मन करता है बस उस अपने नीम बाबा के नीचे कुछ पल और गुजार लेती |मेरे अंधे बाबा अपने अंतिम समय में मुझे लेकर क्या कल्पनाएँ कर पाए होंगे मैं नहीं जानती क्योंकि उस समय तक तो मेरा अस्तित्व भी नहीं था |
पर हमारे पूर्वज हमेशा हमारे साथ स्सये की तरह बने रहते हैं | उस नीम बाबा को देखकर ही मुझे ख्याल आया कि पिताजी के हाथों लगा वह बूढ़ा पीपल शायाद्बाबा के नीम की ही प्रेरणा रहा होगा| सारी की सारी यादों ने अपने सभी पाठ खोल दिए है और मैं बाबली सी कभी इधर तो कभी उधर जाती अपने लगाए छोटे-छोटे पौधों अपनी संतानों के लिए बूढ़ा नीम और पीपल बनाने के स्वप्न देखने लगी हूँ कि कभी मेरे नाती-पोते भी इन पेडों में हमें अनुभव कर पायेंगे|
वहाँ दो भैंसे बंधी हुई थी और सालो पहले जैसा चित्रण माँ किया करती थी उसमें कोई भी बदलाब नहीं हुआ था | मैनें अपने बाबा को कभी नहीं देखा | मेरी बडी दीदी और भैया जब ५-६ साल के रहे होंगे तभी उनका देहावसान हो गया था| उस समय शायद फोटो खींचने का रिवाज नहीं होता होगा सो हमने बाबा को कभी चित्रों में में नहीं देखा था| बस बाबा जीवंत थे तो केवल माँ और पिता के द्वारा बताई गई घटनाओं में| उसी अहाते में एक बहुत- बहुत बूढ़ा नीम का पेड़ था| जब मैंने अपने ताऊ जी से पूछा कि क्या यह पेड़ पिताजी के समय भी था तो वहाँ खड़े एक बुजुर्ग बोले - लाली तेरे बाप के बाप यानी तेरे बाबा का लगाया हुआ पेड़ है यह | सच में मैं बहुत भावुक हो उठी और दोनों हाथों से कसकर उस बूढ़े पेड़ को पकड़ लिया और बाबा कहते हुए फफक उठी | किसी की समझ में नहीं आरहा था कि आखिर मुझे हो क्या गया है | मैं बीना जिसने कभी अपने बाबा को देखा तक नहीं ऐसा क्यों कर रही हूँपर सच बताऊँ न जाने मुझे ऐसा क्यों लगा कि मेरे बाबा अपनी पोती को सूखे पत्ते गिराकर आशीर्वाद दे रहे हों | वो स्पंदन मेरा पीछा आज भी नहीं छोड़ रहा | मन करता है बस उस अपने नीम बाबा के नीचे कुछ पल और गुजार लेती |मेरे अंधे बाबा अपने अंतिम समय में मुझे लेकर क्या कल्पनाएँ कर पाए होंगे मैं नहीं जानती क्योंकि उस समय तक तो मेरा अस्तित्व भी नहीं था |
पर हमारे पूर्वज हमेशा हमारे साथ स्सये की तरह बने रहते हैं | उस नीम बाबा को देखकर ही मुझे ख्याल आया कि पिताजी के हाथों लगा वह बूढ़ा पीपल शायाद्बाबा के नीम की ही प्रेरणा रहा होगा| सारी की सारी यादों ने अपने सभी पाठ खोल दिए है और मैं बाबली सी कभी इधर तो कभी उधर जाती अपने लगाए छोटे-छोटे पौधों अपनी संतानों के लिए बूढ़ा नीम और पीपल बनाने के स्वप्न देखने लगी हूँ कि कभी मेरे नाती-पोते भी इन पेडों में हमें अनुभव कर पायेंगे|
Saturday, January 29, 2011
मै आपकी ही बेटी बनना चाहूंगी |
मेरे अच्छे पिताजी ,
आज आठ वर्ष पूरे हो गयेआपको इस संसार को छोड़े | न जाने किस लोक में होंगे आप और पता नहीं मेरी बात सुन भी पायेंगे या नहीं |हमने संस्कार आपसे तो ही ग्रहण किए कभी आपने कुछ कहा नहीं पर आपका व्यक्तित्व सब कुछ कह देता | आपके चेहरे पर फ़ैली वह निशल मुस्कराहट किसी को भी प्रभावित कर देने के लिए काफी थी|किसी भी दुःख में आपको विचलित होते नहीं देखा| मुझे आज भी वह शाम याद है जब घर में छुटकी के बीमार होने पर हम सभी बहुत परेशान हो गए थे और आपको शांत और अविचिलित देखकर मैंने आपसे कहा भी था आप इतने शांत कैसे रह सकते है ?आपका उतनी ही गंभीरता से भरा जबाव था बेटा दुःख में हाथ पैर छोडने से काम नहीं चलता ,धैर्य रखो और प्रभू का स्मरण करो सब ठीक हो जाए गा | हम संसारी जीवो को उस समय आपका ये गीता जैसा सन्देश अखरा था पर आप कितना सही थे यह बाद में जाना | आपने ही तो सिखाया कि मुसीबत उतनी बड़ी नहीं होती जितना हम उसे आंक लेते हैं किसी समस्या का हल खोजना तो बुद्धिमानी हो सकता है पर उसको लेकर चिंतित होकर बैठ जाना कोई विकल्प नहीं| कितनी यादे आज मेरे जेहन में आरही है| लोग कहते थे कि शर्माजी ५ बेटियों के पिता है फिर भी कैसे मुसकाते रहते हैं |हाँ , पापा शायद आप के कंधे इसीलिए नहीं झुके क्योकि आपने अपनी पुत्रियों को संस्कारवान और मजबूत बनाया | पर पापा, हम बच्चिया आपके लिए बस एक लडकी ही बनी रही |कभी भी संतान होने के दायित्व की पूर्ति नही कर पाई| जो किया भी वह भी इस भाव के साथ कि जैसे कोई अहसान कर रहे हो|आपका अंतिम समय पास था पर हमने कभी भी आपको कमजोर पड़ते नहीं देखा |
कैसे कर पाते थे आप ये सब |दादी तो आपको ९ माह का ही छोड कर चल बसी थी और आपका बचपन इधर-उधर ही बीता |शायद अनुभव ने आपको समय से पहले ही गंभीर बना दिया |आपने अपनी सीमित आमदनी में कैसे हम सबको शिक्षित भी कर दिया| कभी किसी के आगे कभी हाथ पसारते नहीं देखा \सब को अच्छे घरों में ब्याह दिया |पर पापा हमने क्या किया|कभी आप से यह भी नहीं कह सके कि पापा अब आप आराम कीजिये ,हम सब सभाल लेगे |अरे कभी कुछ बाजार से ला भी दते थे तो ऐसा महसूस करते मानो हम बहुत बड़ा बोझ ढोकर लाये है |मैंने बहुत सोचा और अब मुझे लगता है कि फिर मैं आपकी बेटी बनकर ही जन्म लूंगी|
आज आठ वर्ष पूरे हो गयेआपको इस संसार को छोड़े | न जाने किस लोक में होंगे आप और पता नहीं मेरी बात सुन भी पायेंगे या नहीं |हमने संस्कार आपसे तो ही ग्रहण किए कभी आपने कुछ कहा नहीं पर आपका व्यक्तित्व सब कुछ कह देता | आपके चेहरे पर फ़ैली वह निशल मुस्कराहट किसी को भी प्रभावित कर देने के लिए काफी थी|किसी भी दुःख में आपको विचलित होते नहीं देखा| मुझे आज भी वह शाम याद है जब घर में छुटकी के बीमार होने पर हम सभी बहुत परेशान हो गए थे और आपको शांत और अविचिलित देखकर मैंने आपसे कहा भी था आप इतने शांत कैसे रह सकते है ?आपका उतनी ही गंभीरता से भरा जबाव था बेटा दुःख में हाथ पैर छोडने से काम नहीं चलता ,धैर्य रखो और प्रभू का स्मरण करो सब ठीक हो जाए गा | हम संसारी जीवो को उस समय आपका ये गीता जैसा सन्देश अखरा था पर आप कितना सही थे यह बाद में जाना | आपने ही तो सिखाया कि मुसीबत उतनी बड़ी नहीं होती जितना हम उसे आंक लेते हैं किसी समस्या का हल खोजना तो बुद्धिमानी हो सकता है पर उसको लेकर चिंतित होकर बैठ जाना कोई विकल्प नहीं| कितनी यादे आज मेरे जेहन में आरही है| लोग कहते थे कि शर्माजी ५ बेटियों के पिता है फिर भी कैसे मुसकाते रहते हैं |हाँ , पापा शायद आप के कंधे इसीलिए नहीं झुके क्योकि आपने अपनी पुत्रियों को संस्कारवान और मजबूत बनाया | पर पापा, हम बच्चिया आपके लिए बस एक लडकी ही बनी रही |कभी भी संतान होने के दायित्व की पूर्ति नही कर पाई| जो किया भी वह भी इस भाव के साथ कि जैसे कोई अहसान कर रहे हो|आपका अंतिम समय पास था पर हमने कभी भी आपको कमजोर पड़ते नहीं देखा |
कैसे कर पाते थे आप ये सब |दादी तो आपको ९ माह का ही छोड कर चल बसी थी और आपका बचपन इधर-उधर ही बीता |शायद अनुभव ने आपको समय से पहले ही गंभीर बना दिया |आपने अपनी सीमित आमदनी में कैसे हम सबको शिक्षित भी कर दिया| कभी किसी के आगे कभी हाथ पसारते नहीं देखा \सब को अच्छे घरों में ब्याह दिया |पर पापा हमने क्या किया|कभी आप से यह भी नहीं कह सके कि पापा अब आप आराम कीजिये ,हम सब सभाल लेगे |अरे कभी कुछ बाजार से ला भी दते थे तो ऐसा महसूस करते मानो हम बहुत बड़ा बोझ ढोकर लाये है |मैंने बहुत सोचा और अब मुझे लगता है कि फिर मैं आपकी बेटी बनकर ही जन्म लूंगी|
Sunday, January 23, 2011
चलो आज फिर लिखते हैं|
अभी तो नया वर्ष आया और अब यह छब्बीस जनवरी भी आ गई |पिछले पचास सालों से यही सब तो देखते आरहे हैं देश भक्ति का जज्बा जगाने वाले गीत गाये जा रहे हैं -मेरेदेश की धरती सोना उगले उगले हीरा मोती, तिरंगा फहराने की तैयारियां हो रही है तो अपना बचपन फिर यादों में घुस आया है | रंग-बिरंगी झंडियां तैयार करते हम कितने आनंदित रहा करते थे ,विद्यालय में वीर हकीकतराय का नाटक खेला जाता और हकीकतराय का संवाद बोलते-बोलते लगने लगता कि सच मनमें भी देश भक्त हूँ | विद्यालयों में जुलूस लिकाले जाते और हम बच्चे हाथों में झंडा लेकर भारतमाता की जय और बापू की जयजयकार करते | झांकिया निकाली जाती और घरों में सुबह से ही उत्सब का माहौल रहता माँ पिता भी अपने बच्चे की गतिविधियों में आनंद लेते थे\ महिलाए घरों के बाहर जुलूस देखने के लिए आजाती और पिताजी रेडियो और टीवी पर गणतंत्र दिवस की परेड देखते रहते | शायद तब हम सभी मानते थे कि यह हमारा राष्ट्रीय त्यौहार है और इसे हमें पूरे जोश खरोश के साथ ही मनाना चाहिए | लगभग दस दिनों तक हम कार्यक्रम की तैयारी करते रहते |और जब छब्बीस जनबरी पर हमें लड्डू खाने को मिल जाते तब कार्यक्रम का समापन होता और दूसरे दिन छुट्टी देदीजाती कि बच्चे बहुत थक गए होंगे|
अब देखती हूँ तो वो माहौल नजर नहीं आता | छोटे बच्चों को तो यह कहकर अवकाश दे दिया जाता है कि तुम्हारी छुट्टी है और विद्यालयों में होने वालो की कार्यक्रम की बानगी ऐसी है कि शर्म आजाती है | मै्ने भी बच्चों के लिए कार्यक्रम तैयार किए -कुछ देश भक्ति गीत थे दो नाटक थे झान्सी की रानी का कविता वाचन था ,संस्कृत में सरस्वती वन्दना थी और एकबच्चा कृष्ण की भूमिका में नृत्य के लिए प्रस्तुत था | कुछ लोग प्रयास में आये |उन्होंने बच्चों को अभ्यास करते देखा और अनायास कह बैठे क्या मेडम सब फीकाफीका हैमैने पूछा क्या कमी लग रही है आपको तो उन्होंने बड़ी सहजता से जबाव दिया -जब तक कुछ चटपटा न होजाए कार्यक्रम में मजा नहीं आता उनका आशय े मुन्नी बदनाम हुई और शीला कीजवानी से था | मुझे बड़ा क्षोभ हुआ कि बच्चों की जो उम्र संस्कारित करने की होती है हम उसे सुनने और देखने के लिए क्या देते हैं और फिर ठीकरा बच्चों के सर फोड देते हैं किबच्चे बिगडते जा रह हैं | हमारी तो आदत ही हो गई है आलोचना करने की |कभी यह नहीं सोच पाते कि बदलती हुई स्थितियों के लिए आखिर जिम्मेदार कौन है ?क्या राष्ट्रीय पर्व केवल औपचारिकता मात्र रह गए हैं ? न तो हम बच्चों को अपना इतिहास बताते हैं और न उनमें इन संस्कार डालने का प्रयास करते है |बस जब देखो तब एक रटा हुआ संवाद हमारे मुँह से अनायास निकल जाता है क्या करें अब माहौल ही ऐसा हो गया है |
अरे वैसा माहौल रचाने में क्या आप इम्मेबार नहीं है क्या आप समाज और देश के नागरिक नहीं फिर आप अपेक्सएं केवल दूसरों सही क्यों करते हैं अपने हिस्से के कुछ काम तो कीजिए कमसे कम गहर के माहौल को तो साफ़ सुथरा बनाने की कोशिश कीजिए जब आप ही चुनिन्दा कार्यक्रम नहीं देखते तोबच्चों से किस मुँह से कहेंगे | कुछ सोचिए आखिर हम किस दिशा में जारेहेहै ? बच्चों के बिगडते ही हम विद्यालय और समाज को दोष देना शुरू कर देते हैं | कम से कम हमें अपने अभिवावकों से जोशिकायतें रही उनको दोहराने से तो बच सकते हैं पर हमारे यहाँ इस तरह के किसी भी प्रशिक्सान का सर्वथा अभाव है | बच्चे की शारीरिक कमजोरी तो हमें दिख जाती है पर उसका व्यवहार और उसका सोच हमारी चिंता का विषय कभी नहीं बन पाता |
शिकायत करना बहुत आसान है पर समस्याओं के हल खोजना कुछ कठिन अवश्य है | यह धन की अपेक्सा आपके समय और विचार की मांग करता है | हमारा कल जिन हाथों में महफूज है उस ओर अभी से ध्यान देना जरूरी है|
अब देखती हूँ तो वो माहौल नजर नहीं आता | छोटे बच्चों को तो यह कहकर अवकाश दे दिया जाता है कि तुम्हारी छुट्टी है और विद्यालयों में होने वालो की कार्यक्रम की बानगी ऐसी है कि शर्म आजाती है | मै्ने भी बच्चों के लिए कार्यक्रम तैयार किए -कुछ देश भक्ति गीत थे दो नाटक थे झान्सी की रानी का कविता वाचन था ,संस्कृत में सरस्वती वन्दना थी और एकबच्चा कृष्ण की भूमिका में नृत्य के लिए प्रस्तुत था | कुछ लोग प्रयास में आये |उन्होंने बच्चों को अभ्यास करते देखा और अनायास कह बैठे क्या मेडम सब फीकाफीका हैमैने पूछा क्या कमी लग रही है आपको तो उन्होंने बड़ी सहजता से जबाव दिया -जब तक कुछ चटपटा न होजाए कार्यक्रम में मजा नहीं आता उनका आशय े मुन्नी बदनाम हुई और शीला कीजवानी से था | मुझे बड़ा क्षोभ हुआ कि बच्चों की जो उम्र संस्कारित करने की होती है हम उसे सुनने और देखने के लिए क्या देते हैं और फिर ठीकरा बच्चों के सर फोड देते हैं किबच्चे बिगडते जा रह हैं | हमारी तो आदत ही हो गई है आलोचना करने की |कभी यह नहीं सोच पाते कि बदलती हुई स्थितियों के लिए आखिर जिम्मेदार कौन है ?क्या राष्ट्रीय पर्व केवल औपचारिकता मात्र रह गए हैं ? न तो हम बच्चों को अपना इतिहास बताते हैं और न उनमें इन संस्कार डालने का प्रयास करते है |बस जब देखो तब एक रटा हुआ संवाद हमारे मुँह से अनायास निकल जाता है क्या करें अब माहौल ही ऐसा हो गया है |
अरे वैसा माहौल रचाने में क्या आप इम्मेबार नहीं है क्या आप समाज और देश के नागरिक नहीं फिर आप अपेक्सएं केवल दूसरों सही क्यों करते हैं अपने हिस्से के कुछ काम तो कीजिए कमसे कम गहर के माहौल को तो साफ़ सुथरा बनाने की कोशिश कीजिए जब आप ही चुनिन्दा कार्यक्रम नहीं देखते तोबच्चों से किस मुँह से कहेंगे | कुछ सोचिए आखिर हम किस दिशा में जारेहेहै ? बच्चों के बिगडते ही हम विद्यालय और समाज को दोष देना शुरू कर देते हैं | कम से कम हमें अपने अभिवावकों से जोशिकायतें रही उनको दोहराने से तो बच सकते हैं पर हमारे यहाँ इस तरह के किसी भी प्रशिक्सान का सर्वथा अभाव है | बच्चे की शारीरिक कमजोरी तो हमें दिख जाती है पर उसका व्यवहार और उसका सोच हमारी चिंता का विषय कभी नहीं बन पाता |
शिकायत करना बहुत आसान है पर समस्याओं के हल खोजना कुछ कठिन अवश्य है | यह धन की अपेक्सा आपके समय और विचार की मांग करता है | हमारा कल जिन हाथों में महफूज है उस ओर अभी से ध्यान देना जरूरी है|
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