Wednesday, December 30, 2009

नववर्ष की पूर्व बेला पर्

आओ नववर्ष तुम्हारा स्वागत है ।

खुशियों से भरपूर  हमारा आगत है।

पिछला दुख भूल गये अभिनन्दन में

अपना सब अर्पण तेरे वन्दन में।

जो पौधा रोपा था फल उसके आने है

खट्टे -मीठे का स्वाद कराते जाने है ।

तुम  धैर्य  हमारा  बन  जाओ  

शक्तिसम्पन्न  बना  जाओ ।

मन की दुर्बलता हर जाओ,

साहस  का पाठ पढा जाओ ।

जो भी होगा अच्छा होगा.

सूत्र वाक्य समझा जाओ।

नववर्ष तुम्हारा स्वागत है।

मानवता का स्वागत है।

Wednesday, December 23, 2009

मैं

  मैं मैं हूं


और तुम नहीं हो सकती

मैं केवल एक शरीर नहीं

मुझमें भावनाओं का 

अपार समुन्द्र लहराता है

मेरा अपना वजूद है

जो मुझे जिन्दा बनाये रखता है

मैं कठपुतली नहीं हूं 

जो केवल तुम्हारे इशारे पर नाचती रहूं

मेरी डोर अभी तक मेरे हाथों में सुरक्षित है।

मेरे न्यायाधीश बनते शायद तुम भूल गये

कि तुम भी सर्वाधिकार सम्पन्न नहीं

तुम तो पदेन हो ,कुछ समय के लिये

सताधीश बनाये गये हो

हम जैसो की स्वीकृति केबाद

मत इतराओ इतना कि अपना बोध खो बैठो

वर्चस्व सदैव कायम नहीं रहा करता

ये तो समय है कि तुम सत्ताधीश बना दिये गये हो

पर भूलो मत,मानवता का दामन छोडो मत

क्या जानो किस स्वाभिमानी के हाथों तुम्हारा पतन हो

मेरा तो क्या ,मेरा वजूद तो तब भी कायम रहेगा

जब तुम्हारा पतन होगा

पर तुम्हारे लिये बन्द होते सारे रास्ते 

और तुम्हारा बिलखना मुझसे देखा  न जायेगा

इसलिये सुन सकते हो सुनो

सत्ता के मद मेंचूर तुम जोभी हो

तुम्हारा नाम जो भी हो

वही करो जो उचित लगे

मैंने तो अपना मार्ग चुन लिया

अब मुझे क्या,तुम गिरना चाहते हो तो गिरो

पर फिर मत कहनाकि 

मेरा कोई शुभ चिंतक नहीं रहा












Sunday, December 13, 2009

काश अभी हम बच्चे होते

काश अभी हम बच्चे होते 

बच्चे होते सच्चे होते 

किंत अकल के कच्चे होते।

काश कि मां जी फिर आ जाती

मूं गफली पापाजी ला ते,

बिस्तर में ें घुस शौक से खाते


खाते- खाते बातें करते 

कब सो जाते पता न चलता

माथा मेरा पिता सहलाते 
े काश अभी हम बच्चे होते

बच्चे होते सच्चे होते 

पर अकल के कच्चे होते

मां चूल्हे पर दाल चढाती

गरम-गरम खाना दे जाती

नखरे करते नखरे सहती

हमको लेते गोद सुलाती,

पापाजी के कांधे चढते


काश  अभी हम बच्चे होते

बच्चे होते सच्चे होते 

किंतु अकल के कच्चे होते 

खेल -खेलना खूब सुहाता

पढना -लिखना कभी ना भाता

कभी -कभी  शैतानी करते

पिता पहाडे खूब रटाते

काश अभी हम बच्चे होते

बच्चे होते सच्चे होते

किंतु अकल के कच्चे होते 

गरमी में तरबूजा आता

जाड ामुझको खूब सुहाता

 फिर जल्दी से बारिश आती

कागज की हम नाव चलाते

काश अभीहम बच्चे होते 

बच्चे होते सच्चेहोते 

किंतु अकल के कच्चे होते 









Tuesday, December 8, 2009

मां की पाती

मेरे प्यारे बच्चे,

कहा जाता है संतान कलेजे का टुकड़ा होती है।माता-पिता के रक्त से पोषित होती है।माता-पिता अपना भविष्य संतान के आइने में देखते है।खुद गीले में सोकर उसे सूखे में सुलाते हैं,खुद भूखे रहकर उसकी क्षुधा शांत करते हैं।वे यह सब करते हैं क्योंकि वे जानबूझ कर,कृत संकल्पित हो उस जीव को दुनियां में लाते है।वे संतान पर कोई अहसान नहीं कर रहे होते,वरन, प्रकारांतर से अपनासुख ही खोज रहे होते हैं।

दुनियादारी की रीत से तुम भी कोख में आये,अपने अन्दर अपने अंश को समाये जननी आत्ममुग्ध  होती रही,तुम्हे अपनी गोद में पा निहाल हो उठी,बधावे गाये जाने लगे,सब और सुख और चैन की वंशी बजने लगी।शिशु से बालक,किशोर और युवा होते तुममें शैशव ही तलाशती रही,अपने हाथों की ओट लगातुम्हारा सुरक्षा घेरा ही बने रही।जान ही न पाई कि उसका अंश कब इक व्यक्तित्व बन गया,भरापूरा व्यक्ति,अपना भला-बुरा समझने बाला,अपने निर्णय पर अडिग रहने वाला समझदार सा शासक बन गया।अपने फैसले खुद लेने वाला एक इंसान,अपने भबिष्य की योजनाओं को मूर्त रूपदेने वालाएकपरिवार का स्वामी।

जन्मदाता  ठगे से देखते रह गये,जो संसकार डाले थे,न जाने कहां लुप्त हो गये।तुम अपने वैज्ञानिक सोच और तर्कों में इतने मशगूल हो गये कि माता-पिता की कोमल भावनायें तुम्हारे ताकतवर जूतों के नीचेदब कर रह गयी.

ठोडा बहुत सिसकी भी होंगी,तो पोप मूजिक का शोर इतना अधिक थाकि किसी को कुछ सुनाई भी नहीं दिया। और सुनाई पडा भी हो तो किसके पास इतनी फुरसत थी कि उस पर ध्यान देता।

समय बीता,तुम पल्लवित,पुश्पित होते रहे,गाहे-बगाहे आधी -अधूरी सूचनायें मिलती रही।माता-पिता एक स्वप्न से जागे तो देखा सब कुछ बदल गया था,न वह उल्लासथा और न उमंगे।अब क्या करते,जीने के लिये किसको लक्ष्य बनाते।अब तक जो भी था, वह तुम्हारे आस-पास तक ही सीमित था।बिखरता मनोबल संभाला,जो शेष था,बटोरा और अबका लक्ष्य चुना जिसमें प्यार तो था,भावनायें तो थी पर साथ ही साथ अनुरक्ति नहीं थी ,था तो केवल इक कर्तव्य बोध .अप्ने शेष जीवन को हंसी-खुशी बिताने की इच्छा,जो बीत गया.उससे उबरपाने  की सामर्थ्य,और एक दूसरे को जान पाने का संकल्प।

मैं यह सब तुम्हें एसलिये लिख रही हूंताकि सनद रहे,अपनी संतान के हाथों प्रवंचित होते  तुम टूटो नही,फिर से जी उठने का साहस रखो,क्योंकि समय बदला है तो बयार बदलेगी ही।मां हूंना, इसलिये लिख भर दिया है चाहो तो पढलेना और जरूरत महसूस न हो तो अन्य बेटों के लिये छोड देना।दुनिया बहुत बडी होती है,जननी न सही,पालिता के भी अनेक-अनेक संतानें हुआ करती है,मेरे ऊपर उनका भी ऋणबकाया है, सो वह भी मां के दिल की बात सुन लेंगें।

                         मां           मां          मां            मां                      =---------------

Monday, December 7, 2009

फर्क होता है ।

किताबों में लिखा होता है,पूरी वसुधा कुटुम्ब होती है।

सब अपने होते हैऔर पराया तो कोई होता नहीं

पर लिखे हुए को पढ्ना और व्यवहार में होते देखना 

दो   भिन्न  -भिन्न   अनुभव   हुआ   करते      है ।

सोचना और करना ,एक ही समय में दो रूपों को जीना

मतलब दो  चेहरों  के मुखोटे एक साथ लगा लेना

अपने  दुखों  को  दिल   में  गहरे  छुपा कर

चेहरे पर  ओढी  हुई  मुसकान   चस्पा कर 

एक ही समय में दो विपरीत  ध्रुवों को 

पास  लाने   की      बेवजह  कोशिश करना 

और फिर अप ईमानदारी का ये हश्र देखना 

सारी यादों का टूट -टूट कर बिखरते जाना

कतल करने वाले हाथों का आंसुओं को पोंछना

और सब कुछ यूं सह लेना जैसे कुछ  घटा ही नहीं

आदर्श बनाये रखने के लिये  घुट-घुट कर जीना

सच तो नहीं होता है ,फिर  भी सच  होता है 

इसलिये फिर कहती हूं फर्क होता ही है

अपने और  पराये  में, मेरे   और तेरे में

इस में और उसमें,हममें और तुम में

और अब भी जिद बाकी है कि वसुधा कुटुम्ब 

हुआ करती है ,तो झेलते रहो,धोखे खाते रहो

और पूरी दुनिया को अपना मानने और समझने

की जिद पकडे रहो,पर अपने बनाये उसूलों को

तोडो मत,और लकीर पक्की ,बात पक्की

कि मेरे लिये तो वसुधा ही कुटुम्ब है

Saturday, November 21, 2009

क्या ये कच्ची भावुकता भर है?

आज बहुत सारी यादों को दफन कर 

उन पर एक भारी सा पत्थर रख दिया

मैंने अपने को ,अपने आंसुओं के सैलाब को रोकने 

की कोशिश ,भरसक कोशिश की

पत्थर दिल बनने का नाटक भी रचा

पर ज्यों ही मेरा बचपन ,मेरी अनमोल यादें,

दुछत्त्ती पर छुपा-छुपाई याद आई

अपने बगीचे की मिट्टी  की सोंधी खुशबू

नथुनों में समाई,सपनों में सारी की सारी दीबारें  

गले लिपट कर रोई,बालपन कीशरारतें 

याद आई,मेरा सारा का सारा बड्बोलापन 

कपूर सा उडनछू हो गया,और मेरी आंखों से 

बहती गंगा-जमुना को नेरा आभिजात्यपन 

भी नहीं रोक पाया ,

मुझसे ही सवाल जबाब शुरु कर दिये

मेरे जमीर ने ,तो यही तेरा असली चेहरा

उतर गये सारे नकाब ,खुल गई सारी असलियत 

अब मैं  खुद से ही नजरें चुराती हूं,अपने को 

और अकेला पाती हूं,लोगों का क्या

वे मेरी कविता को कच्ची भावुकता भर मानते हैंं

और व्यावहारिक होने की सलाह देते 

शायद भूल जाते हैं कि हमारा अतीत कैसा भी हो 

आखिर हमारा होता है और सब कुछ बदल जाने पर

भी हमारा दामन नहीं छोडता ,सात समुन्दर पार भी

साथ चला आता है हमें बताने कि 

सब कुछ यूं ही खतम नहीं हो जाता।


Sunday, November 1, 2009

सब कुछ अच्छा ही होता है।

विपरीत परिस्थिति में ही व्यक्ति के व्यक्तित्व में निखार आता है। कहने को तो ये उपदेश सुनने का सबसे बेहतर समय होता है।आप आप नहीं रहते बल्कि एक सब्जेक्ट बन जाते हैं जिस पर प्रयोग किये जासकते है।पिछले दो माह से मैं स्वयम इस स्थिति से गुजर रही हूं। कभी-कभी मुझे लगने लगा कि मेरे हाथ -पैर बांध दिये गये हैं और मैं इंच भर भी नहीं हिल सकती।इन दिनों मैंने खूब पढा और पढाही नहीं कुछेक बातों को तो अमल में भी लाई।और देखा कि जिन्दगी का हर पल खूब शिद्दत से जीना चाहिये।दर असल जिन्दगी में करने के लिये इतना कुछ है कि आप कभी रुक ही नहीं सकते।हां,यह आपको ही निशिचय करना होता है कि आप कौन सी दिशा चुने। आप कठिनाई को पहाड समझे या उसे जिन्दगी का एक अहम हिस्सा माने।जिन दिनों मैं अस्वस्थता की शिकार रही,उन दिनों ही मैंने सीखा कि मुस्कराकर आप अपना दर्द ही कम नहीकरते बल्कि सामने वाले के मन में भी उत्साह

का संचार कर देते हैं।इन दिनों मुझे बच्चों को नजदीक से देखने और समझने का अवसर मिला।कितनीकितनी बातें होती है उनके पास जिसे वह आपके साथ शेअर करना चाहते है। मेरे अच्छे मित्र हमेशा मुझे सकारात्मक सुझाब देते रहते है। और अब तो मैंने दर्द के साथ जीना भी सीख लिया है। आज बहुत दिनों बाद लिख रही हूं लेकिन अब नियमित लिखूगीं।