हम सभी अपने बच्चों की पढाई को लेकर बहुत चिंतित रहते हैं पर क्या कभी आपने गौर किया है कि आपका लाडला अपने बचपन में किस प्रकार के खेल खेलता है |ये आलेख लिखते -लिखते मुझे अपना बचपन याद आगया और मैंने वे सभी खेल यहाँ लिख दिए जो हम खेला करते थे| शायद आप भी बच्चों के लिए इसमें से कुछ चुन ले | वैसे तो आज के मॉडर्न युग में इतने बड़े-बड़े समर केम्प लगा दिए जाते हैं कि हम सभी अपने बच्चों को वहीं भेजने में अपना बडप्पन मानते हैं| पर अब भी कुछ खेल बाकी है जिनको खिलाकर हम अपने बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास कर सकते हैं |
1. पोसमपा भई पोसमपा
पोसम पा भई पोसम पा
डाकियो ने क्या किया
सौ रुपये की घड़ी चुराई
अब तो जेल में फंसना पडेगा
जेल की रोटी खानी पड़ेगी
जेल का पानी पीना पडेगा
अब तो जेल में रहना पडेगा|
2. तितली तितली रंग दे |
कैसा
मन चाहे जैसा
लाल
बच्चे लाल रंग की वस्तुओ को छूकर बताएँगे |
ऐसे ही सब रंगों का नाम लेकर बच्चों को रंगों की जानकारी देंगे |
३. सभी बच्चे छोटा गोला बनाकर घूमेंगे|
एक बच्चा बाबा बनेगा |
सभी बच्चे उससे पूछेंगे|
बाबा बाबा कहाँ जारहे
गंगा नहाने
गंगा तो ये रही
ये तो छोटी है
एक पैसा डाल दो
बडी हो जाएगी |
(बाबा बना बालक उसमें पैसा डालेगा और बच्चे गोले को बड़ा कर लेंगे|) आओ मिलकर गंगा नहाएं |
४. बच्चे अपनी मुठ्ठी एक दूसरे की मुठ्ठी के ऊपर रख लेंगे|
(बच्चे गायेंगे )
बाबा बाबा आम दो
( एक कहेगा )
आम है सरकार के
(सभी बच्चे )
हम भी हैं दरबार के
(पहला बच्चा कहेगा)
एक आम उठा लो
( सभीबच्चे आम उठा कर)
ये तो खट्टा है
दूसरा उठा लो
मीठा है मीठा है
मेरा आम मीठा है |
५. पक्षियों का नाम लेकर कहेंगे तोता उड़ ,चिड़िया उड़|
बीच –बीच में जानवरों का नाम लेकर कहेंगे- गाय उड़,कुत्ता उड़ | यदि बच्चा जानवर के नाम पर भी अपनी अंगुली उठा देता है तो वह खेल से निकल जायेगा|
६, सभी बच्चे अपना अपना हाथ जमीन पर रख लेंगे | एक बच्चा सभी के हाथों को छूता हुआ गाना गायेगा
अटकन बटकन दही चटकन वन फूले बंगाले
मामा लायो सात कटोरी एक कटोरी फूटी
मामा की बहू रूठी
काहे बात पे रूठी खाने को बहुतेरो
दूध दही बहुतेरो |
राजा के भयो लड़का
बिछा दे रानी पलका
अंतिम शब्द जिसके हाथ पर आएगा वह खेल में निकल जाएगा ऐसे करके सबसे बाद में जो बच्चा रह जाएगा सभी लोग उसके हाथों पर चपत मारेंगे उसे अपना हाथ बचाना होगा | इसी प्रकार खेल खेला जाएगा |
७. इन खेलों के अतिरिक्त गेंद के खेल (सेका सिकाई ,गिट्टी फोड ,सात टप्पे) ऊँच-नीच ,किल किल कांटे,नीली पीली साड़ी ,खो-खो ,रस्सी कूद ,गुटके ,स्टापू (जमीन पर आकृति बनाकर उसके खानों में गोटी डालना )अन्त्याक्षरी ,संज्ञा शब्द खेल (नाम-व्यक्ति, वस्तु, शहर,जानवर,पिक्चर )पर्ची खेल ( राजा, वजीर, चोर, सिपाही )छूहा छाही ,विष अमृत ,गुड़िया-गुड्डे के खेल ,केरम,साँप -सीढ़ी,लूडो ,पतंग,गुल्ली डंडा, कंचे गोली अवश्य खिलाए जाए | ये खेल बच्चों के शरीर को स्वस्थ रखते हैं साथ ही उनकी मानसिक क्षमता में वृद्धि भी करते हैं|बच्चे अनुकरण से सीखते हैं | कई बार वे अपने खेलों का निर्माण खुद कर लेते हैं जैसे डाक्टर बनकर सुईं लगाना और दवाई देना , टीचर बनकर बच्चों को पढ़ाना ,माता पिता बनकर उनके जैसा व्यवहार करना ये सभी खेल बच्चे स्वयं निर्मित करते हैं और अपने को अभिव्यक्त करते हैं |अपने बच्चों के बचपन के खेल देखकर हमें उनकी रूचि पता लगती है | कुछ बच्चों को कला बनाना बहुत पसंद है तो कुछ बच्चे अपने बेग में अपना खजाना रखते हैं मसलन चूड़ी के कुछ टुकड़े, कुछ तस्वीरें, कुछ कंचे कुछ टूटी पेंसिलें जो माता पिता और टीचर की निगाह में कूड़ा हो सकती हैं पर बच्चे को अपना ये खजाना बहुत प्रिय होता है बल्कि कहें कि वे इसे अपना राज्य मानते हैं और हम बड़े उस बच्चे के उस बेशकीमती खजाने को कूड़ा समझ कर फेंक देते हैं|मैंने भी कई बार ये गलती की कि जब बच्चों का बेग देखती थी तब उनकी बेशकीमती चीजों को बड़ी निर्ममता से फेंक दे देती थी| इस बार प्रयास के एक बच्चे ने बड़ी मासूमियत से कहा दीदी क्या आपको पता है कि जो सामान आपने फेंक दिया वह मैं ने कितनी मुश्किल से ओदा था | सच ही हमें बच्चों के प्रति अपना नजरिया बदलना होगा | अब इतना ही | शेष अगली पोस्ट में
Monday, June 13, 2011
Sunday, May 8, 2011
मैं और माँ
हाँ माँ न जाने मुझे बार-बार यही लगता है कि मैं आप जैसी माँ नहीं बन पाई | पता नहीं कहाँ चूक हुई और कैसे हुई मुझे अहसास तक नहीं हुआ और अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत| आपने कभी हमें मारा नहीं पर आपकी डाट ही हमारे लिए बहुत बड़ी सजा होती थी| आज जब बच्चे अपने- अपने दायित्व की दुनिया में सिमट गये हैं तो लगता है जैसे हमारा कोना खाली होगया| पर माँ मुझे तो आधी उम्र पार कर लेने पर भी हर समस्या को सुलझाने में आप ही याद आती हो| हम तो पाँच बहिने थे किस कुशलता से आपने घर को सम्भाला इसका अहसास तो आज होता है जब दो बच्चों की परवरिश में भी चूक हो जाती है | अब समझ आता है आप की तीसरी निगाह हमेशा हमारी पीठ पर क्यों टिकी रहती थी| मम्मी शायद आज के बच्चे ज्यादा व्यावहारिक हो गये हैं| वे अपना भलाबुरा हमसे अच्छी तरह जानते होंगे|कितनी तो बातें है जो आपसे शेयर करना चाहती हूँ | और रिश्तों की दुनिया तो इतनी तेजी से बदली है कि स्नेंगी तो आप भी अचरज में पड़ जायेंगी| जो कल तक सीधे मुँह बात नहीं करते थे आज वे बादल झमाझम बरस रहे हैं| शायद उस लोक में आपको कुछ शक्तियां जरूर मिली हैं |कभी कभी तो रिश्तों का ये व्याकरण मुझे समझ नहीं आता तो छोटी से पूछती हूँ | कब छतीस तिरेसठ हो जाए कोई नहीं जानता| मुझे ध्यान आता है आप कहा करतीथी नवन नीच की अति दुखदाई तो अब मै सतर्क तो हूँ |
और सुनाओ माँ, वहाँ की दुनिया कैसी हैं, क्या वहाँ भी छल कपट और गन्दगी है या सभी लोग चैन की वंशी बजाते हैं |
क्या कहा ,सब कुछ ऐसा ही है जैसा यहाँ था | अरे माँ ऐसा तो होना ही था | वहाँ भी तो ये ही पड़ौसी बसते होंगे जो यहाँ थे| तो फिर कहीं चले जाओ अपनी अकल से ही काम लेना पडता है|लोग तो कहते हैं आज की माँ सुपर मोम बन गई है पर मुझे लगता है वह एक अच्छी कार्यकत्री तो जरूर हो गई है पर वात्स्ल्ट का वितरण सही तरह से नहीं कर पा रही है| यदि हमारे बच्चे गलत रास्ता पकडे तो क्या हम उन्हें रोकेंगे नहीं पर आज तो यह सिस्टम ही खतम हो गया है कहा जाने लगा है बच्चे हमसे अधिक समझदार है वे अपना भला बुरा सब समझते हैं |क्या माता पिताआउट डेटेड हो गये हैं | तो चलो ऐसा ही सही हमने तो अपनी जिम्मेदारी निभादी अब उनकी बारी है और माँ ए माँ तो यही चाहती है न कि उसके बच्चे जहां रहे खुश रहे तो माँ मैंने भी यही धीरज धार लिया है कि हमारा क्या .जैसे इतनी कलात गई शेस भी काट जायेगी|पर अपने स्वार्थ के लिए बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड तो नहीं कर सकते| आखर हम माँ जो ठहरे| हमेशा बदली परिस्थितियों से समझौता बिठा ही लेते हैं |
माँ दिवस पर तुम्हें ढेरों शुभकामनाएं |
जब तक आप ज़िंदा थी हम जानते ही नहीं थे कि माँ दिवस भी होता है हमारे लिए तो हर दिन की शुरुआत ही माँ से होती थी और जब आप आज यादों के पटल पर हो ये दिन मुझे बहुत याद आता है| है|
और सुनाओ माँ, वहाँ की दुनिया कैसी हैं, क्या वहाँ भी छल कपट और गन्दगी है या सभी लोग चैन की वंशी बजाते हैं |
क्या कहा ,सब कुछ ऐसा ही है जैसा यहाँ था | अरे माँ ऐसा तो होना ही था | वहाँ भी तो ये ही पड़ौसी बसते होंगे जो यहाँ थे| तो फिर कहीं चले जाओ अपनी अकल से ही काम लेना पडता है|लोग तो कहते हैं आज की माँ सुपर मोम बन गई है पर मुझे लगता है वह एक अच्छी कार्यकत्री तो जरूर हो गई है पर वात्स्ल्ट का वितरण सही तरह से नहीं कर पा रही है| यदि हमारे बच्चे गलत रास्ता पकडे तो क्या हम उन्हें रोकेंगे नहीं पर आज तो यह सिस्टम ही खतम हो गया है कहा जाने लगा है बच्चे हमसे अधिक समझदार है वे अपना भला बुरा सब समझते हैं |क्या माता पिताआउट डेटेड हो गये हैं | तो चलो ऐसा ही सही हमने तो अपनी जिम्मेदारी निभादी अब उनकी बारी है और माँ ए माँ तो यही चाहती है न कि उसके बच्चे जहां रहे खुश रहे तो माँ मैंने भी यही धीरज धार लिया है कि हमारा क्या .जैसे इतनी कलात गई शेस भी काट जायेगी|पर अपने स्वार्थ के लिए बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड तो नहीं कर सकते| आखर हम माँ जो ठहरे| हमेशा बदली परिस्थितियों से समझौता बिठा ही लेते हैं |
माँ दिवस पर तुम्हें ढेरों शुभकामनाएं |
जब तक आप ज़िंदा थी हम जानते ही नहीं थे कि माँ दिवस भी होता है हमारे लिए तो हर दिन की शुरुआत ही माँ से होती थी और जब आप आज यादों के पटल पर हो ये दिन मुझे बहुत याद आता है| है|
Sunday, April 24, 2011
प्रत्यावर्तन
बदलती घटनाओं से
कभी चमत्कृत होती
तो कभी संशय में आजाती हूँ|
दरअसल घटनाएँ जिस रूप में
मोड लेरही हैं आजकल
उसे क्या नाम दूं |
बरसों के भटके रिश्ते
बड़ी आत्मीयता जता रहे हैं
और वे नाते जिन्हें
इतने यत्नों से पाला पोषा
आज नज़रों से ओझल
होते जा रहे है|
मानो अब उनका टर्म
समाप्त होरहा हो |
आदतन सहज विशवास
कर ही लेती हूँ
बड़ी से बड़ी घटना पर|
पर रिश्तों का ये प्रत्यावर्तन
मुझे उलझन में
उलझा रहा है |
और मै अवश सी सब कुछ
ऐसे स्वीकारती हूँ
मानो ये सब नियति का हिस्सा है |
औरमुझे अब ये ही रोल अदा
करना है |
कभी चमत्कृत होती
तो कभी संशय में आजाती हूँ|
दरअसल घटनाएँ जिस रूप में
मोड लेरही हैं आजकल
उसे क्या नाम दूं |
बरसों के भटके रिश्ते
बड़ी आत्मीयता जता रहे हैं
और वे नाते जिन्हें
इतने यत्नों से पाला पोषा
आज नज़रों से ओझल
होते जा रहे है|
मानो अब उनका टर्म
समाप्त होरहा हो |
आदतन सहज विशवास
कर ही लेती हूँ
बड़ी से बड़ी घटना पर|
पर रिश्तों का ये प्रत्यावर्तन
मुझे उलझन में
उलझा रहा है |
और मै अवश सी सब कुछ
ऐसे स्वीकारती हूँ
मानो ये सब नियति का हिस्सा है |
औरमुझे अब ये ही रोल अदा
करना है |
Thursday, April 14, 2011
कब तक पुकारू ?
ये कैसी कठिन परीक्षा
मेरे प्रभु
मैं तो पुकार- पुकार
कर थक चुकी
पर तुम न आये |
मेरा विश्वास
अभी भी
जस का तस है
कि
प्रभु सच्चे मन
की पुकार सुनते तो जरुर होंगे|
पर अब तो गले से बोल भी नहीं फूटते
मैं शांत,अविचल और निश्चिंत
आज भी तेरी ही
राह तकती हूँ
क्या पता न जाने
कब और कहाँ से तेरा
आगमन हो
और मुरझाई बेल
फिर से पल्लवित हो जी उठे|
मेरे प्रभु
मैं तो पुकार- पुकार
कर थक चुकी
पर तुम न आये |
मेरा विश्वास
अभी भी
जस का तस है
कि
प्रभु सच्चे मन
की पुकार सुनते तो जरुर होंगे|
पर अब तो गले से बोल भी नहीं फूटते
मैं शांत,अविचल और निश्चिंत
आज भी तेरी ही
राह तकती हूँ
क्या पता न जाने
कब और कहाँ से तेरा
आगमन हो
और मुरझाई बेल
फिर से पल्लवित हो जी उठे|
Friday, April 1, 2011
हम कौन खेत की मूली है ?
रुकावटें नहीं हटतीं तो न हटें
सफलताएं नही मिलतीं तो न मिलें
अपने पराए होते हों तो होते रहें
खजाने खाली होते हों तो हुआ करें
दोस्त मुँह फेरते हो तो फेरते रहें
मुझे सच में कुछ भी बुरा नहीं लगता |
बस मेरा विश्वास
मेरी मान्यताएं
मेरे संस्कार
मेरी लेखनी
मेरा उत्साह
मेरे आदर्श
मेरा सकारात्मक सोच
कहीं भी और किसी भी परिस्थिति में
मेरा दामन न छोड़े|
चलती रहूँ सत्यपथ पर
न सूखे मेरी ममता का स्रोत|
और कम से कम हिम्मत
तो जबाव न दे
तो देखना ये छोटी छोटी बाधाएं
ये गहराते से संकट
ये लम्बी चुप्पी
ये दोगली सामाजिकता
ये दोहरे व्यक्तित्व
भला क्या बिगाड़ पायेंगे
सिवाय इसके कि स्वयं ही
अडिग पत्थरों से
टकरा- टकरा कर
खुद अपना अस्तित्व खो दें|
और सच ,
गर्वोन्नत सच
अपनी तेजोमय गरिमा के साथ
अपनी धारदार प्रखरता के बल पर
फिर से प्रतिष्ठित
होगा इस भूतल पर |
धैर्य तो रखो बंधु
ज़रा विश्वास तो रखो|
जब राम ,मर्यादा पुरुषोत्तम राम
अकारण ही चौदह वर्ष
का वनवास झेलते हैं |
और पांडव वन-वन मारे फिरते हैं
योगीराज कृष्ण के जन्म से पूर्व
ही कंस क्रूर बन जाता है|
विवेकानंद और दयानंद भी
नहीं बखसे जाते तो
भला हम कौन
खेत की मूली है ?
सफलताएं नही मिलतीं तो न मिलें
अपने पराए होते हों तो होते रहें
खजाने खाली होते हों तो हुआ करें
दोस्त मुँह फेरते हो तो फेरते रहें
मुझे सच में कुछ भी बुरा नहीं लगता |
बस मेरा विश्वास
मेरी मान्यताएं
मेरे संस्कार
मेरी लेखनी
मेरा उत्साह
मेरे आदर्श
मेरा सकारात्मक सोच
कहीं भी और किसी भी परिस्थिति में
मेरा दामन न छोड़े|
चलती रहूँ सत्यपथ पर
न सूखे मेरी ममता का स्रोत|
और कम से कम हिम्मत
तो जबाव न दे
तो देखना ये छोटी छोटी बाधाएं
ये गहराते से संकट
ये लम्बी चुप्पी
ये दोगली सामाजिकता
ये दोहरे व्यक्तित्व
भला क्या बिगाड़ पायेंगे
सिवाय इसके कि स्वयं ही
अडिग पत्थरों से
टकरा- टकरा कर
खुद अपना अस्तित्व खो दें|
और सच ,
गर्वोन्नत सच
अपनी तेजोमय गरिमा के साथ
अपनी धारदार प्रखरता के बल पर
फिर से प्रतिष्ठित
होगा इस भूतल पर |
धैर्य तो रखो बंधु
ज़रा विश्वास तो रखो|
जब राम ,मर्यादा पुरुषोत्तम राम
अकारण ही चौदह वर्ष
का वनवास झेलते हैं |
और पांडव वन-वन मारे फिरते हैं
योगीराज कृष्ण के जन्म से पूर्व
ही कंस क्रूर बन जाता है|
विवेकानंद और दयानंद भी
नहीं बखसे जाते तो
भला हम कौन
खेत की मूली है ?
Sunday, March 20, 2011
होली का आना
कब से तो बाट जोह रहे थे तेरी होली कि तू जल्दी से आजा| कितने रंग है जो तेरी प्रतीक्षा में सूखे जा रहे है|अरे साल भर का त्यौहार होता है बर्षों से सुनते आरहे है कि कमसेकम आज केदिन तो सब पुरानी दुशम नी भुला कर गले मिलजाना चाहिएऔर गाना भी गाते है कि दुश्मन भी गले मिल जाते है और फिर एक और रसिया के बोल कान में पड़ते हैं आज ब्रज में होली में रसिया| सारे के सारे टी वी चेनल दिन रात होली के रंगारंग प्रोग्रामों से अटे पड़े है |जो वास्ताविक हो ली नहीं खेल पारहे वे अपनी हाईटेक की आभासी दुनिया में मस्त है| बाजार भी भरे पूरे है| मतलब होली अपने पूरे आगाज के साथ आई है| कल होलिका दहन पर पूरी कोलोनी वाले इकठ्ठे तो हुए |सबने मिलबांटकर प्रसाद भी खाया और आज सुबह भी पार्कमें दूसरों पर गुलाल अबीर चन्दन लगाते लगा कि बस सब आपसी वैरभाव भुलादिए गए है बस अब तो रामराज्य आया ही समझो | मन खुश हो गया चलो इतने सालो बाद ही सही अब होलीहोली सी तो लगी पर ये सब तो मैं सपना देख रही थी |नीद टूटी तो देखा तो सब रोज जैसा ही था |थोड़ी देर के लिए सबने मुखौटे पहन लिए थे| सब हंसने और खुश होने का नाटक कररहे थे |दरअसल ये लोग गले नहीं मिल रहे थे बस औपचारिकता पूरी कर रहे थे और बहने वे तो दस कदम आगे थी |एक दूसरे के मुँह से तीसरे की बातें की जा रही थी| कोई इस से ही संतुष्ट था कि चलो अब कम सेकम मिल तो रहे है |धीरे -धीरे सब ठीक हो जाएगा| इस पूरे आयोजन में एक ऐसा व्यक्ति भी थी जो मिस्टर मखीजा के यहाँ किराए पर आया था |उसने अभी-अभी अपना गाँव छोड़ा था और उसके मन में अपना अतीत हिलोरे मार रहा था | जब हम तथाकथित कहे जाने वाले सभी लोग अपने होलीमिलन समारोह में मस्त् थे तो वह्सज्जन बहुत गंभीरता से हमारेव्यवाहार को नोट कर रहा था | अभी कुछ देर पहले ही त्रिपाठी उठ कर गया है और कुछ ऐसे सवाल मेरी बैठक में छोड़ गया है जिनके उत्तर मैं खोज रही हूँ |बिट बीन द लायन जो उसने अनुभव किया उसी के शब्दों में रख रही हूँ -दीदी क्या आपको ऐसा नहीं लगा कि सब लोग एक डिस्टेंस मेंटेन कर रहे थे?आपस में सौहार्द नहीं था और कोई किसी के गले तो मिला ही नहीं |बस माथे पर गुलाल लगाकर औपचारिकता पूरी कर ली गई| न कोई हंसा न किसी ने ठिठोली कि और सभी यह कहते हुए अपने -अपने घरों में चले गए कि टीवी पर कार्यक्रम आरहा होगा| किसी को मेच देखाना था तोकिसी को अपने मन पसंद सीरियल छूट जाने का भय सता रहाथा | न तो आप लोगो ने कोई होली गाई और नहीं आपसी संवाद हुए| आपके यहाँ ऐसे ही होती है होली| इसी को कहते है आप होली मिलन समारोह|उससे अच्छा तो मुझे आपके यहाँ बैठकर लगा जहां आपने और सर ने होली से जुड़े इतने सारे तथ्य तो उजागर किए | दीदी जो हम पांच के मध्य आज हुआ कल पचास के बीच क्यों नहीं घट पाया | यदि सारे बुजुर्ग नई जनरेशन को होली का औचित्य समझा पाते तो आज के ये नन्हे मुनन्ने कम से कम अपनी संस्कृति से परिचित तो हो पाते | जब मैंने धीरे से अपनी बात रखी भी तो सभी ने उसे हंसी में उड़ा दिया- अरे त्रिपाठी ये सब तो टीवी सीरियलों से बच्चे जान ही लेते हैं |फिर गूगल सर्च करके सब जान जाते है |रही बात होलीगाने की तो सब सीडी में मिलता है| इस सबसे तुम इतने परेशान क्यों हो| दुनिया को दुनिया की तरह लेना सीखो|
सच ही कह गया वह नवागत कि जब सब कुछ रेडीमेड मिलने लग गया है तो हमारे बच्चे भी हमें रेडीमेड व्यवहार देने लगे तो न तो हमें व्यथित होना चाहिए और न हीं हमें अपसंस्कृति का रोना रोना चाहिए|
सच ही कह गया वह नवागत कि जब सब कुछ रेडीमेड मिलने लग गया है तो हमारे बच्चे भी हमें रेडीमेड व्यवहार देने लगे तो न तो हमें व्यथित होना चाहिए और न हीं हमें अपसंस्कृति का रोना रोना चाहिए|
Tuesday, March 8, 2011
क्या आज ही महिला दिवस है ?
आप कहते हैं तो मान लेते हैं कि आज ८ मार्च है और यह दिन हम महिलाओं के नाम समर्पित है पर लगता तो नहीं कि महिलाओं का भी कोई दिवस होता है| वही हर रोज जैसी सुबह है, दिन भी कमोवेश वैसा ही बीत जाएगा और रात उसे तो बीतना ही होता है | आज मेरी सेविका ने पूछा कि दीदी आज क्या त्यौहार है? बेटी कह रही है कि माँ आज तो अखबार में लिखा है कि महिला दिवस है | क्या आज मेरा मर्द मुझे दारू पीकर नहीं पीटेगा और क्या आज मुझे काम से भी छुट्टी मिलेगी| कम से कम एक दिन तो हमें भी आराम का मिलना ही चाहिए| हमारा भी तो मन होता है कि बरस दो बरस में कभी अपने मन का करें | क्यों क्या तुम रोज दूसरे की मर्जी से जीती हो |अब उसका मुँह खुल ही गया- अरे जब से माँ की कोख में आए हैं तब ही से हमें खतम करने की पूरी की पूरी साजिश रची गई पर शायद तब मोड़ा मोडी की जांच के साधन नहीं होते होंगे तभी तो मैं इस संसार में आ गई| पली, बड़ी पर सब कुछ चुपचाप होता रहा न मन में कोई उल्लास था और न कोई उमंग| अभी दस साल की भी नहीं हुई कि अम्मा को मेरे ब्याह की चिंता लग गई| हमेशा यही सुनाती रही तू तो पराये घर की अमानत है| जितनी जल्दी अपने घर पहुँच जाए तो हम गंगा नहाले |बापू को भी हमेशा यही कहते सुना तेरे हाथ पीले कर दू तो चिंता दूर हो जाए| मै तो जब से जन्मी माँ बाप के लिए चिंता ही बनी रही| ये १४ सालके होंगे और मैं १२ बरस की तब मुझे घर से विदा कर दिया गया| ससुराल पहुँच कर सोचा अब तो अपने घर आगई | पर भेद तो बाद में खुला कि ये घर भी मेरा नहीं था यहाँ भी सास कहती रही अरे पराये घर से आई है | चार पांच बालक हो गए मर्द की कमाई से घरखर्च पूरा नहीं होता तो खुद भी काम ढूढ़ लिया पर अभी तक कुछ भी नहीं बदला | अब लडके कहते है कि लडकियों को पढाने लिखाने की क्या जरूरत है जल्दी जल्दी लड़का देख कर ब्याह दें अपने घर जाए क्या जरूरत है पढाने लिखाने की बस चूल्हा चौका का काम सिखा दे | अभी तक तो मैं अपने कारण ही परेशान थी पर अब बेटियों का दुःख खाए जाता है | सभी मर्द एक जैसे ही होते हैं कौन सा लड़ाका देखू सबको इक ही बात सिखाई गई है कि औरत तो पैर की जूती है बस दान्त्मार कर काबू में रखो हाथ से निकल नी नहीं चाहिए ज्यादा खिलाने पिलाने की कोई जरूरत नहीं मोटी होगी तो ब्याह में परेशानी | दीदी अब आप ही बताओ कि मैं किस दिन को महिला का दिन समझू ये आप बड़े लोगों के चोंचले होते होंगे हमारे लिए तो जैसी ८मार्च वैसे ही और दिन |
मैं समझ नहीं पा रही कि कि मैं उसे क्या जबाब दूं | किन प्रगतियों को गिनाऊ और कौन से झूठे आश्वासन दूं बस इतना ही कह पाई देख जब तेरी बिटिया पढ़ लिख लेगी तब तुझे इन बातों के अर्थ समझ आयेंगे| किताबोंमें सब लिखा होता हैकि क्या सच है और क्या झूठ | उसको तो मैंने विदा कर दिया |\,पर मैं अपने मन को ही नहीं समझा पारही कि क्या वाकई महिला दिवस पर हम कुछ विशेष हो जाते हैं |यदि शिक्षा ही हमारे अंदर बदलाब लापाती तो आज भी आम औरत को घरेलू हिंसा का शिकार क्यों होना पढ़ता? क्यों लग्भ्स्ग रोज ही मासूम बच्चियां बलात्कार की शिकार होती और न ही यह समाज अपनी आधी आबादी के साथ इतना अमानवीय हो पाटा / प्रश्नोंके उत्तर तो मेरे भी पास नहीं हैं पर मैं इन प्रश्नों से स्वयं को बहुत ही घिरा महसूस कर रही हूँ ? हो सकता है आप मेरी कुछ सहायता कर सकें मेरे इन सवालों का यह अर्थ कतई नहीं है कि हम महिला दिवस पर खुश न हो और नकारात्मक सोंचें पर हम यह विचार अवश्य करें कि आखिर यह आधा अधूरा ज्ञान हमें कहाँ ले जारहा है?
मैं समझ नहीं पा रही कि कि मैं उसे क्या जबाब दूं | किन प्रगतियों को गिनाऊ और कौन से झूठे आश्वासन दूं बस इतना ही कह पाई देख जब तेरी बिटिया पढ़ लिख लेगी तब तुझे इन बातों के अर्थ समझ आयेंगे| किताबोंमें सब लिखा होता हैकि क्या सच है और क्या झूठ | उसको तो मैंने विदा कर दिया |\,पर मैं अपने मन को ही नहीं समझा पारही कि क्या वाकई महिला दिवस पर हम कुछ विशेष हो जाते हैं |यदि शिक्षा ही हमारे अंदर बदलाब लापाती तो आज भी आम औरत को घरेलू हिंसा का शिकार क्यों होना पढ़ता? क्यों लग्भ्स्ग रोज ही मासूम बच्चियां बलात्कार की शिकार होती और न ही यह समाज अपनी आधी आबादी के साथ इतना अमानवीय हो पाटा / प्रश्नोंके उत्तर तो मेरे भी पास नहीं हैं पर मैं इन प्रश्नों से स्वयं को बहुत ही घिरा महसूस कर रही हूँ ? हो सकता है आप मेरी कुछ सहायता कर सकें मेरे इन सवालों का यह अर्थ कतई नहीं है कि हम महिला दिवस पर खुश न हो और नकारात्मक सोंचें पर हम यह विचार अवश्य करें कि आखिर यह आधा अधूरा ज्ञान हमें कहाँ ले जारहा है?
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