Wednesday, December 30, 2009

नववर्ष की पूर्व बेला पर्

आओ नववर्ष तुम्हारा स्वागत है ।

खुशियों से भरपूर  हमारा आगत है।

पिछला दुख भूल गये अभिनन्दन में

अपना सब अर्पण तेरे वन्दन में।

जो पौधा रोपा था फल उसके आने है

खट्टे -मीठे का स्वाद कराते जाने है ।

तुम  धैर्य  हमारा  बन  जाओ  

शक्तिसम्पन्न  बना  जाओ ।

मन की दुर्बलता हर जाओ,

साहस  का पाठ पढा जाओ ।

जो भी होगा अच्छा होगा.

सूत्र वाक्य समझा जाओ।

नववर्ष तुम्हारा स्वागत है।

मानवता का स्वागत है।

Wednesday, December 23, 2009

मैं

  मैं मैं हूं


और तुम नहीं हो सकती

मैं केवल एक शरीर नहीं

मुझमें भावनाओं का 

अपार समुन्द्र लहराता है

मेरा अपना वजूद है

जो मुझे जिन्दा बनाये रखता है

मैं कठपुतली नहीं हूं 

जो केवल तुम्हारे इशारे पर नाचती रहूं

मेरी डोर अभी तक मेरे हाथों में सुरक्षित है।

मेरे न्यायाधीश बनते शायद तुम भूल गये

कि तुम भी सर्वाधिकार सम्पन्न नहीं

तुम तो पदेन हो ,कुछ समय के लिये

सताधीश बनाये गये हो

हम जैसो की स्वीकृति केबाद

मत इतराओ इतना कि अपना बोध खो बैठो

वर्चस्व सदैव कायम नहीं रहा करता

ये तो समय है कि तुम सत्ताधीश बना दिये गये हो

पर भूलो मत,मानवता का दामन छोडो मत

क्या जानो किस स्वाभिमानी के हाथों तुम्हारा पतन हो

मेरा तो क्या ,मेरा वजूद तो तब भी कायम रहेगा

जब तुम्हारा पतन होगा

पर तुम्हारे लिये बन्द होते सारे रास्ते 

और तुम्हारा बिलखना मुझसे देखा  न जायेगा

इसलिये सुन सकते हो सुनो

सत्ता के मद मेंचूर तुम जोभी हो

तुम्हारा नाम जो भी हो

वही करो जो उचित लगे

मैंने तो अपना मार्ग चुन लिया

अब मुझे क्या,तुम गिरना चाहते हो तो गिरो

पर फिर मत कहनाकि 

मेरा कोई शुभ चिंतक नहीं रहा












Sunday, December 13, 2009

काश अभी हम बच्चे होते

काश अभी हम बच्चे होते 

बच्चे होते सच्चे होते 

किंत अकल के कच्चे होते।

काश कि मां जी फिर आ जाती

मूं गफली पापाजी ला ते,

बिस्तर में ें घुस शौक से खाते


खाते- खाते बातें करते 

कब सो जाते पता न चलता

माथा मेरा पिता सहलाते 
े काश अभी हम बच्चे होते

बच्चे होते सच्चे होते 

पर अकल के कच्चे होते

मां चूल्हे पर दाल चढाती

गरम-गरम खाना दे जाती

नखरे करते नखरे सहती

हमको लेते गोद सुलाती,

पापाजी के कांधे चढते


काश  अभी हम बच्चे होते

बच्चे होते सच्चे होते 

किंतु अकल के कच्चे होते 

खेल -खेलना खूब सुहाता

पढना -लिखना कभी ना भाता

कभी -कभी  शैतानी करते

पिता पहाडे खूब रटाते

काश अभी हम बच्चे होते

बच्चे होते सच्चे होते

किंतु अकल के कच्चे होते 

गरमी में तरबूजा आता

जाड ामुझको खूब सुहाता

 फिर जल्दी से बारिश आती

कागज की हम नाव चलाते

काश अभीहम बच्चे होते 

बच्चे होते सच्चेहोते 

किंतु अकल के कच्चे होते 









Tuesday, December 8, 2009

मां की पाती

मेरे प्यारे बच्चे,

कहा जाता है संतान कलेजे का टुकड़ा होती है।माता-पिता के रक्त से पोषित होती है।माता-पिता अपना भविष्य संतान के आइने में देखते है।खुद गीले में सोकर उसे सूखे में सुलाते हैं,खुद भूखे रहकर उसकी क्षुधा शांत करते हैं।वे यह सब करते हैं क्योंकि वे जानबूझ कर,कृत संकल्पित हो उस जीव को दुनियां में लाते है।वे संतान पर कोई अहसान नहीं कर रहे होते,वरन, प्रकारांतर से अपनासुख ही खोज रहे होते हैं।

दुनियादारी की रीत से तुम भी कोख में आये,अपने अन्दर अपने अंश को समाये जननी आत्ममुग्ध  होती रही,तुम्हे अपनी गोद में पा निहाल हो उठी,बधावे गाये जाने लगे,सब और सुख और चैन की वंशी बजने लगी।शिशु से बालक,किशोर और युवा होते तुममें शैशव ही तलाशती रही,अपने हाथों की ओट लगातुम्हारा सुरक्षा घेरा ही बने रही।जान ही न पाई कि उसका अंश कब इक व्यक्तित्व बन गया,भरापूरा व्यक्ति,अपना भला-बुरा समझने बाला,अपने निर्णय पर अडिग रहने वाला समझदार सा शासक बन गया।अपने फैसले खुद लेने वाला एक इंसान,अपने भबिष्य की योजनाओं को मूर्त रूपदेने वालाएकपरिवार का स्वामी।

जन्मदाता  ठगे से देखते रह गये,जो संसकार डाले थे,न जाने कहां लुप्त हो गये।तुम अपने वैज्ञानिक सोच और तर्कों में इतने मशगूल हो गये कि माता-पिता की कोमल भावनायें तुम्हारे ताकतवर जूतों के नीचेदब कर रह गयी.

ठोडा बहुत सिसकी भी होंगी,तो पोप मूजिक का शोर इतना अधिक थाकि किसी को कुछ सुनाई भी नहीं दिया। और सुनाई पडा भी हो तो किसके पास इतनी फुरसत थी कि उस पर ध्यान देता।

समय बीता,तुम पल्लवित,पुश्पित होते रहे,गाहे-बगाहे आधी -अधूरी सूचनायें मिलती रही।माता-पिता एक स्वप्न से जागे तो देखा सब कुछ बदल गया था,न वह उल्लासथा और न उमंगे।अब क्या करते,जीने के लिये किसको लक्ष्य बनाते।अब तक जो भी था, वह तुम्हारे आस-पास तक ही सीमित था।बिखरता मनोबल संभाला,जो शेष था,बटोरा और अबका लक्ष्य चुना जिसमें प्यार तो था,भावनायें तो थी पर साथ ही साथ अनुरक्ति नहीं थी ,था तो केवल इक कर्तव्य बोध .अप्ने शेष जीवन को हंसी-खुशी बिताने की इच्छा,जो बीत गया.उससे उबरपाने  की सामर्थ्य,और एक दूसरे को जान पाने का संकल्प।

मैं यह सब तुम्हें एसलिये लिख रही हूंताकि सनद रहे,अपनी संतान के हाथों प्रवंचित होते  तुम टूटो नही,फिर से जी उठने का साहस रखो,क्योंकि समय बदला है तो बयार बदलेगी ही।मां हूंना, इसलिये लिख भर दिया है चाहो तो पढलेना और जरूरत महसूस न हो तो अन्य बेटों के लिये छोड देना।दुनिया बहुत बडी होती है,जननी न सही,पालिता के भी अनेक-अनेक संतानें हुआ करती है,मेरे ऊपर उनका भी ऋणबकाया है, सो वह भी मां के दिल की बात सुन लेंगें।

                         मां           मां          मां            मां                      =---------------

Monday, December 7, 2009

फर्क होता है ।

किताबों में लिखा होता है,पूरी वसुधा कुटुम्ब होती है।

सब अपने होते हैऔर पराया तो कोई होता नहीं

पर लिखे हुए को पढ्ना और व्यवहार में होते देखना 

दो   भिन्न  -भिन्न   अनुभव   हुआ   करते      है ।

सोचना और करना ,एक ही समय में दो रूपों को जीना

मतलब दो  चेहरों  के मुखोटे एक साथ लगा लेना

अपने  दुखों  को  दिल   में  गहरे  छुपा कर

चेहरे पर  ओढी  हुई  मुसकान   चस्पा कर 

एक ही समय में दो विपरीत  ध्रुवों को 

पास  लाने   की      बेवजह  कोशिश करना 

और फिर अप ईमानदारी का ये हश्र देखना 

सारी यादों का टूट -टूट कर बिखरते जाना

कतल करने वाले हाथों का आंसुओं को पोंछना

और सब कुछ यूं सह लेना जैसे कुछ  घटा ही नहीं

आदर्श बनाये रखने के लिये  घुट-घुट कर जीना

सच तो नहीं होता है ,फिर  भी सच  होता है 

इसलिये फिर कहती हूं फर्क होता ही है

अपने और  पराये  में, मेरे   और तेरे में

इस में और उसमें,हममें और तुम में

और अब भी जिद बाकी है कि वसुधा कुटुम्ब 

हुआ करती है ,तो झेलते रहो,धोखे खाते रहो

और पूरी दुनिया को अपना मानने और समझने

की जिद पकडे रहो,पर अपने बनाये उसूलों को

तोडो मत,और लकीर पक्की ,बात पक्की

कि मेरे लिये तो वसुधा ही कुटुम्ब है

Saturday, November 21, 2009

क्या ये कच्ची भावुकता भर है?

आज बहुत सारी यादों को दफन कर 

उन पर एक भारी सा पत्थर रख दिया

मैंने अपने को ,अपने आंसुओं के सैलाब को रोकने 

की कोशिश ,भरसक कोशिश की

पत्थर दिल बनने का नाटक भी रचा

पर ज्यों ही मेरा बचपन ,मेरी अनमोल यादें,

दुछत्त्ती पर छुपा-छुपाई याद आई

अपने बगीचे की मिट्टी  की सोंधी खुशबू

नथुनों में समाई,सपनों में सारी की सारी दीबारें  

गले लिपट कर रोई,बालपन कीशरारतें 

याद आई,मेरा सारा का सारा बड्बोलापन 

कपूर सा उडनछू हो गया,और मेरी आंखों से 

बहती गंगा-जमुना को नेरा आभिजात्यपन 

भी नहीं रोक पाया ,

मुझसे ही सवाल जबाब शुरु कर दिये

मेरे जमीर ने ,तो यही तेरा असली चेहरा

उतर गये सारे नकाब ,खुल गई सारी असलियत 

अब मैं  खुद से ही नजरें चुराती हूं,अपने को 

और अकेला पाती हूं,लोगों का क्या

वे मेरी कविता को कच्ची भावुकता भर मानते हैंं

और व्यावहारिक होने की सलाह देते 

शायद भूल जाते हैं कि हमारा अतीत कैसा भी हो 

आखिर हमारा होता है और सब कुछ बदल जाने पर

भी हमारा दामन नहीं छोडता ,सात समुन्दर पार भी

साथ चला आता है हमें बताने कि 

सब कुछ यूं ही खतम नहीं हो जाता।


Sunday, November 1, 2009

सब कुछ अच्छा ही होता है।

विपरीत परिस्थिति में ही व्यक्ति के व्यक्तित्व में निखार आता है। कहने को तो ये उपदेश सुनने का सबसे बेहतर समय होता है।आप आप नहीं रहते बल्कि एक सब्जेक्ट बन जाते हैं जिस पर प्रयोग किये जासकते है।पिछले दो माह से मैं स्वयम इस स्थिति से गुजर रही हूं। कभी-कभी मुझे लगने लगा कि मेरे हाथ -पैर बांध दिये गये हैं और मैं इंच भर भी नहीं हिल सकती।इन दिनों मैंने खूब पढा और पढाही नहीं कुछेक बातों को तो अमल में भी लाई।और देखा कि जिन्दगी का हर पल खूब शिद्दत से जीना चाहिये।दर असल जिन्दगी में करने के लिये इतना कुछ है कि आप कभी रुक ही नहीं सकते।हां,यह आपको ही निशिचय करना होता है कि आप कौन सी दिशा चुने। आप कठिनाई को पहाड समझे या उसे जिन्दगी का एक अहम हिस्सा माने।जिन दिनों मैं अस्वस्थता की शिकार रही,उन दिनों ही मैंने सीखा कि मुस्कराकर आप अपना दर्द ही कम नहीकरते बल्कि सामने वाले के मन में भी उत्साह

का संचार कर देते हैं।इन दिनों मुझे बच्चों को नजदीक से देखने और समझने का अवसर मिला।कितनीकितनी बातें होती है उनके पास जिसे वह आपके साथ शेअर करना चाहते है। मेरे अच्छे मित्र हमेशा मुझे सकारात्मक सुझाब देते रहते है। और अब तो मैंने दर्द के साथ जीना भी सीख लिया है। आज बहुत दिनों बाद लिख रही हूं लेकिन अब नियमित लिखूगीं।

Sunday, October 11, 2009

मत बैठो तुम हारे से

बन बहुमूल्य रत्न पडा,आज गले में शान से 

मत भूलो वो भी निकला है,अंधियारे की खान से

दिन में जिसे कोइ न पूछे,उसे पहचान मिली अंधियारे से

कठिनाई आये तो संघर्ष करो, मत बैठो तुम हारे से

जीवन में कठिनाई क्या आई,दुर्भाग्य बता कर कोस रहे

घुटने मत टेको लड जाओ,बाद में न फिर अफसोस रहे

आहा। कितना सौभाग्य है उसका,जिसने कठिनाई पाई है

कठिनाई ही तो जीवन को,उच्च शिखर पर लाई है

बिना संघर्ष के कुछ पाना,जीत नहीं एक मात है

तूफानों से लडे जो कश्ती,उसमें आखिर कुछ बात है

सुनहरी चमक पाने के खातिर ,सोने ने  दी परीक्षा है

कठिनाई हमारी मित्र है,यही इस कविता की शिक्षा है।

                   डां वरूण भारद्वाज के सौजन्य से प्राप्त

Monday, September 14, 2009

आखिर इन बच्चों का कसूर क्या है?

मेरे जेहन में एक प्रश्न अक्सर कोंधता है  क्या हम बडों का अपने बच्चों के ऊपर अपनी इच्छाओं को लादना जायज है? हम जो-जो नहीं बन पाए हैं, वह सारी अपेक्षाए बच्चों के माध्यम से पूरी करवाना कहां तक उचित है। आप कह सकते हैंमाता- पिता अपने बच्चों में अपना सपना प्रतिबिम्बित होते देखना चाहते हैतो इसमें क्या बुराई है? आपके तर्क के सम्बन्ध में कहना चाहूंगी कि बच्चा भी अपने में एक सम्पूर्ण इकाई है। उसने भी अपने भविष्य को लेकर कुछ सपने देखें हैं।वह भी अपनी को प्रमाणित करना चाहता होगा। हो सकता है उसके भविष्य की योजनाओं और हमारे सोचे गये सपनों में जमीन -आसमान का अंतर हो।हो सकता है उसने अपनी क्षमताओं के हिसाब से एक नया कार्यक्षेत्र चुना हो।ऐसी स्थिति में हमें अपने वार्डों का सह्योग करना चाहिये। हम एक अच्छे गाइड तो जरूर बनें,उसे क्षेत्र विशेष की सम्भावनाओं से अवगत अवश्य करादें,े अपने अनुभवों का लाभ अवश्य दें,उसके   सहयोगी अवश्य बनें पर  उस पर अपने को लादें नहीं,उसे अपने अनुसार बढंनेदें।
उसे नसीहतें देते समय अपना बचपन नहीं भूलें। हम अपने सुझाव अवश्य रख सकते हैं पर यह सामने वाले पर निर्भर करता है वह इन सुझावों के प्रति कितना ग्रहणशील है।बच्चों को उपदेश की भाषा से एलर्जी होती है।वे हमारा सम्मान करें यह जितना आवश्यक है उतना ही ध्यान इस बात पर भी दें कि हम अपना बडप्पन बनाए रखें, हर समय की आलोचना बच्चों में खीज पैदा करती है, उन्हें लगता है कि आप उन्हें लेकर सीरियस नहीं है। जब आपका मन होता है आप उन्हेंडांटने लगते है'कभी हाथ भी छोड देते हैं क्योंकि आपका मानना है लातों के भूत बातों से नहीं मानते।आप नहीं जानते कि इसका कितना बडा खामियाजा हमें भोगना पडता है।बच्चे उस समय तो चुप हो जाते हैं पर आपको लेकर उनके मन में जो धारणा बन जाता है उसे जल्दी नहीं बदला जा सकता है।बच्चे का मन समझने के लिये खुद बच्चा बनना पडता है।उसकी मानसिक स्थिति में खुद को रख कर देखिये तो समझ आयेगा कि दुनियां में कोई भी डांट खाना पसन्द नहीं करता है, किसी को भी अपनी आलोचना सुनना पसन्द नहीं होता। यदि बात को समझा कर कहा जाये ,तो बच्चे जरूर समझते है। मैं अक्सर मांओं कोएक वाक्य कहते  सुनती हूं आने दे तेरे पापा को,आकर ऐसी पिटाई लगायेगें कि तुझे अक्ल आजायेगी। ये जुमले बच्चों के मन में पिता के प्रति नकारात्मक रूख पैदा करते हैं। अच्छा हो यदि बच्चा गलती पर है तो आप उसे उसी समय समझा दें।उसे अहसास करा दें कि तुम्हारी कई भी गलत जिद पिता अथवा मेरे द्वारा पूरी नहीं की जायेगी।

  बच्चे बच्चे हीहोते हैं,और उन्हें बचपन में ही प्रोढ बना देना हमारा लक्ष्य नहीं होना चाहिये।कभी- कभी बच्चों का कसूर उतना बडानहीं नहीं होता जितना बडा दण्ड हम उनके लिये निर्धारित कर देते है।यहां तक कि चोरी और झूठ भी वह अपने किसी विशेष प्रयोजन से बोलते है। यदि उनका प्रयोजन वैसे ही सिद्ध हो जाये तो उन्हें गाली देने, झूठ बोलने और चोरी करने की नौबत ही नहीं आयिगी।


Sunday, September 6, 2009

फुलक के स्थान पर मूल को सींचे।

प्राथमिक शिक्षा किसी भी देश की शिक्षा व्यवस्था की नींव है और यही नींव की ईंट सर्वाधिक उपेक्षित और अवहेलना का शिकार बनी हुई है।प्राइमरी का मास्टर सामाजिक विसंगतियोंसे इस कदर जकडा हुआ हैकि उसे केवल किटकिन्ना सिखाने वालाअ,आ ,इ सिखाने वाला मान लिया जाता हैउसके कार्य को बडा हल्का करके देखा जाता है।एक प्राथमिक विद्यालय का परिद्रश्य कुवछ इस प्रकार सामने आता हैब्लेकबोर्ड पर लिखे हुए कुछ वर्ण,उसे कापी पर तीपते बच्चे,बातों मशगूल और बच्चो को पीटते, हडकाते,डांटते ,अधैर्यशाली अध्यापक।ढेर सारी पुस्तकों से भरे बैग के साथ थके हुए,और उदास चेहरा लिये नन्हे-मुन्ने।आखिर हमारे देश के भविष्य के लिये इतना बोझिल पाठ्यक्रम क्यों रख दिया गया है? क्या एक स्लेट-बत्तीअथवा कागज -कलम और कुछ अक्षर कार्डों के साथ इन्हें नहीं सिखाया जा सकता?जब तक वह अक्षर भी नहीं जान पाता,भारीए-भारी वाक्यों से लदी-फदी पुस्तक उसके हाथों मेंथमा दी जाती हैऔर उससे अपेक्षा की जाती हैकि वह सब कुछ रटले,सुनादे,और 80-90%अंकों के साथ अगली कक्षा में चला जाये।और अध्यापक के काम की इतिश्री मान ली जाती है।क्या हम कभी सोच पाते है किबच्चे की यही कच्चाई,वर्ण और मात्राओं न पहचान पासकने की योग्यता उसके भविष्य पर कालिख पोट देती है,उसकी यही कम्जोरी बडे होने तक बनी रहती है।
दरअसल्प्राथमिक स्तर पर विषय की जानकारी के स्थान पर केवल लिखने, सुनने, बोलने और पढने की योग्यता का विकास ही किया जाना चाहिये जिससे वह वर्णों को पह्चान सके,उसे स्वयम लिख सके,वर्णों को मिलाकर पढ सके। मात्राओं पर और संयुक्त वर्णों पर जितना अधिक ध्यान इस अवस्था मेंदे दिया जायेगा उतनी ही लेखन की नींव पक्की हो जायेगी।फिर वह किसी भी कक्षा की पुस्तक को पढ सकेगा और्किसी भी शब्द को लिख सकेगा।
वैसे तोमुझे युवावर्ग और प्रोढ शिक्षार्थियों को पढाने का अवसर ही सदैव मिला पर अपनी प्रयास संस्था में कची मिती जैसे बालकों को ही सिखा रही हूं और मुझे ये अनुभव मेरे मानस बच्चे ही देरहे हैं। कभी- कभी मुझे बच्चों के इस प्रश्न का उत्तर देना भी बहुत कठिन होता है कि दीदी बच्चे को कौन सी किताब लेकर आनी है और मेरा उत्तर कि नहीं इन्हें खाली हाथ आने दो, मैं इन्हें ऐसे ही पढाउगीं .उन्हें आचर्य में डाल देता है पर धीरे - धीरे वे मेरी बात समझ जाते हैं इसलिये फिर कहती हूं जड में पानी दो, पतूं को सींचने से कुछ नहीं होगा।



Wednesday, September 2, 2009

कल की चिंता छोडो और वर्तमान में रहो

किसी दार्शनिक ने कहा था" भविष्य की चिंता मत करो,वह स्वत: संभल जायेगा क्योंकि तुम्हारा वर्तमान क्या कम है तुम्हे परेशान करने के लिये।"भगवान ईसा ने कहा था,"कल की चिंता छोड दो।"सर विलियम आसलर कहा करते थेकि"कल की चिंता छोडो और आज की सीमा में रहो---"ईसा से तीनसओ वर्श पूर्व रोम के एक प्रसिद्ध कविहोंस ने अपनी कविता में कहा था-"वर्तमान का जो निर्माण कर ले,आज के विश्वास के सहारे,कल को जो निषकाम कर ले,भोगेगा वही सुख भर्पूजो पर्याय सुख का निज नाम कर ले।"सारी की सारी उक्तियां यही संकेत करती है किवर्तमान अतीत के गुबार में सिमट जाता है,स्वयम अतीत हो जाता है। भविष्य भी आपका नहीं होता---फिर इसकी चिंताक्यों?हां जब वह वर्तमान का जामा पहन कर आये तो उसे भी देख लीजियेगा।प्राचीन रोमन विचारक कहते थे "जो आज है उसका ही भरपूर उपयोग करोभविष्य के लालच में पडकर आज की सौगात मत
गंवाओ।
सभी महान विचारकों के कथन से यही निष्कर्ष निकलता है कि मनुष्य को भूत और भविष्य की चिंता छोदकर वर्तमान पर ही केन्द्रित होना चाहिये।संशय और भय की अवस्था सबसेवधिक खतरनाक होती है। आपकी एकाग्रता नष्ट होजाती है,मन अशांत हो जाता है,एधर -उधर भटकता रहता है। आपका मनोबल इतना कम्जोर हो जायेगा किआप निरणय लेने की शक्ति खो बैठेगें। जो व्यक्ति स्वयम निर्णय नहीं ले सकता है वह सदा दूसरोंकीउधार में ली गई बुद्धि की वैशाखियों के सहारे चलेगा।किसी परेशानी के आने पर हम चिंतन करें न कि चिंता में ही अपनी रातें बिता दें। चिंता रतजगों के अनछाहे आयोजनों को जन्म देती है
तो हम आज से ही अपने आज को खूबसूरत बनाने में लग जाये ं क्योंकि कम से कम आज तो केवल आपका और आपका हीहै।

















। जान रस्किन ने अपनी पढ्ने की मेज पर एक पे

Tuesday, September 1, 2009

मां की प्रथम पुण्य तिथि पर्

अगर लूं इस धरती पर जन्म दोबारा
मां तू ही देना अपना प्यार सारा
यूं तो वर्ष भर पहले छोड दिया साथ
पर जीवन के हर पल में तुम रहती हो मेरे पास
तुम जाने वाली थी फिर भी पूछा मेरा हाल
बचपन से अब तक की कितनी घटनायें आती हैयाद
मा6 का जीवन में होना क्या होता है
अब और समझ आया है तेरे जाने के बाद

तुम कहती ठीक जब ऊपर जाना होगा
बताउगींवहां क्या-क्या होता है
तब तुम्हारी बातों पर हंसती थी मैं
लेकिन अब मां एक बार बता देती कैसी है वहां।
क्या देख पाती हो कितना तरसते हैं तेरे लिये
यूं तो बहुत खुश हूंअपने घर में
पर तेरे पास जाना कराता था
मुझे मां का अहसास ।

तुम्हारी बात याद है"दीदी में देखना मुझे"
करती भी हूं ऐसा ,दीदी भी मानती है मुझे बेटी
पर दिल में छुपी तेरी यादें
बार -बार लौटाती हैं मुझे पीछे

फिर से तेरे दिय्रे संसकारों को समेटे
बढती हूं राह में आगे
तेरी भूमिका में उतरने की कोशिश करती हूं
और रखती हूं तुझे सदा अपने पास

मां का खोना क्या होता है
समझ पाई हूं तेरे जाने के बाद

प्यारी बहिन अनुपम सारस्वत के सौजन्य से

मां की प्रथम पुण्य तिथि पर्

अगर लूं इस धरती पर जन्म दोबारा
मां तू ही देना अपना प्यार सारा
यूं तो वर्ष भर पहले छोड दिया तुमने साथ
पर जीवन के हर पल मेंतुम रहती हो मेर्रे साथ



तुम जाने वाली थीफिर भी पूछा था मेरा हाल
बचपन से अब तक की कितनी घटनायें आती है याद

मा

Saturday, August 29, 2009

दुनियादारी

आज जमाना झूठ का,सच मांगता भीख
झूठे- झूठे सिर चडे,सत्य हो गया दीन
सत्य हो गया दीन ,करें अब क्या कोई
झूठ बोलना सीखिए,सच की खो गई लोई
विनती करता सच फिरे,कोई न माने बात

सत्य बेचारे की रही,आज यही औकात


झूठ बोलना सीखते ,क्यों होते बदहाल
साधु तेरी नम्रता , न होती फटेहाल
न होती फटेहाल, ठाठ तेरेभी होते।
कर सकते थे राज,कनाडा बैठे-बैठे
अब भी खुद को तौलताधर्म तुला पर तू
धीरज धर फिर बैठ जामौन होजा तू,र्म

Thursday, August 27, 2009

पिता के लिये

दिन की शुरुआत,आज का सुप्रभात,पक्षिओंकी चह्चहाट,माता की कसमसाहट,भ्राता की घबराहट,बिटिया की अकुलाहट,नाती-पोतोंकी तुतलाहट'सब कुछ तुम्हे समर्पित है पिता।
पिता जब तुम थे,कभी जाना ही नही,पिता का न होना,कैसा लगता होगा,मासूमोंको।
बस किताबों पडी और्दादी-नानी की कहानी से सुनीकथाओं से भी कहांअनुमान लगा पाते थे ।
बस दुख मेंडूब कह भारत देते थे च-च वह पिताविहीन है,और हमपिता के साये तले फिर रुनझुन-गुनगुन मेंसिमट जाते।
जब हम खुद मा-पिता के पद से नवाजे गये तब भीतुम्हारे अनुभव हमें सहारा देतेऔर हम पित्रत्व के बोझ तले भी तेरी गोद में आबच्चे ही बने रहते ।
पर अब
जब तुम सिमा गये हो, राख बन बहा भी दियेगये होपवित्र गंगा में,तुम्हारी फोटो पर चडाया गयाचमकता बडा सा हार र्भी तुम्हारे जाने को नही ,अस्तित्व को ही बडाबा देता है। मां का सूना- सूना माथा,सूनी कलाई,और नंगे -नंगे से पांव हमें रुलाने के लिये भरपूर मददगार होते हैं


पर हम बडे बनकर जल्दी से रुलाई को गले में ही घोंट कर,बडे समझदार से बनते,मां और छोटों को ढाढस बधाते,उन्हें गीता सुनाने लगते है
कभी-कभी तो उनकी मूर्खता परर्डांट भी पिलाने लगते है
पर ,पिता शायद आप नहीं जानते,यह सब करते -करते हम कितना टूट जाते है। भरभराया दिल तेरी गोद में बैठ गले तक़ आने लगता है और हम समझदारी दिखाते फिर अपने कच्चेपन का गला घोंत,अपनी सुबकियों को रोक एक जिम्मेबाराना व्यवहार निभाते- निभाते ,इतना थक जाते है
कि बस आकाश में चमकते तारे से तेरा पता पूछ बस तुझसे दो बात करना चाहते हैंजानते हुये भी
कि तेरी दुनिया में हम जैसों का प्रवेश अब निषिद्ध हैक्योंकि शेष बचे दायित्वों को पूरा करने के लिये हम छोदे गये हैं पिता तेरे द्वारा।
पिता सच-सच बताओ,क्या जब हुये थे तुम पिता विहीन तब कुछ ऐसा ही घटा था ,जैसा आजकल मेरे साथ घटता है।।।

Thursday, August 13, 2009

बच्चे ऐसे भी सीखते हैं

बच्चों को पढाने के दौरान नये -नये अनुभवों की श्रंखला मेंएक नया अध्याय और जुडा।जो बच्चे चार- पांच लाइन भी याद नहीं कर पाते थे उन्ही बच्चों ने अनेको देश भक्ति गीत बहुत जल्दी याद कर लिये और इतना ही नही बडे उत्साह और प्रसन्नता से खुशी- खुशी। मुझे याद है हर बच्चा गाना गाने की होड मे सबसे आगे रहना चाहता था।जो सानाज कक्षा में जरा भी नहीं बोलती ठीक वही बच्ची गाते समय बहुत स्पश्ट बोल रही थी। तब से मैंने नियम बना लिया कि गीत, कविताओ और कहानी के माध्यम से अधिकाधिक सिखाउगी।

Wednesday, August 5, 2009

ये लडकियां

पहाड जैसे दुख सहकर भी
क्यों होती है मोम सी सम्वेदंशील ये लडकियां
पिता, भाई,पति और पुत्र को
सहेजे रखकर भी
क्यों होती है अकेली ये लडकियां
निभाने की कोशिश करती
अपने दायित्वों को,फिर भी दूसरी क्यों होती हैं
यि लडकियां
केवल कर्तव्य करतीऔर अधिकारों सि वंचित
क्यों होती हैंये लडकियां
जिन्दगी का बोझ सिर पर उठाये
तेज गति से चलती,फिर भी नाजुक
क्यों होती हैं,ये लडकियां
उम्र भारत तपती आग के आगे
रोटी सेंकती और भाजी छोंकती
फिर भी जलने को विवश
क्यों होती है,ये लडकियां
घर के सामानों को सजाती-संवारती
मकान को घर बनाती,फिर भीघर से वंचित
क्यों होती हैं येलडकियां
मात्र लिंग भेद के चलते
और सामाजिकता के नाते,दोयम दर्जे की हो जाती है
क्यों ये लडकियां
कभी देवी तो कभी डायन पद पाती
पर मानवी न हो पाती
क्यों ये लडकियां
भाइयों की जुठन खाती
और भाइयों के लिये आड बनती
क्यों प्यारी बहना नहीं बन पाती
ये लडकियां
सबकी आवाज सुनती ,समझती और गुनती
बहरी कही जाती है
क्यों एय्लडकियां
सबके जख्मों को भरती और मरहम लगाती
फिर भीखुद लहुलुहान
क्यों होती है ये लडकियां
सारे प्रशनों का इक ही उत्तर है
सारे सवालों का इक ही हल है
ये सब घटता है पूरे विश्व में
क्योंकि लडकियां होती ही है लडकियाको

अनुभूति

ये पीपल का पेड और पास बैठी धूप सेंकती मै
अपने पिता का स्पर्श अनुभूत कर पाती हूं
क्योंकि मेरे पिता के हाथों रोपा छोटा पौधा
आज वट व्रक्ष में तबदील हो आकाश को छूता सा
पतझड में पत्ते बरसातासूखे पत्तों की मरमराहट सा गुनगुनाता
मुझे आशीश देता सा कहता है बिटिया लोटाभार rजल से सींचा मुझे
हाथ जोड पूजा मुझे< दीपक रख मुझे किया उजियार,और घंटोखडी रही मुझे निहार।
अब सुनता हूं एक गूंज हवाओं मेंकि मुझे बेचा जायेगा
ऐरे गैरों के हाथोंसौदा किया जायेगाऔर तुम इतराती सी
हरे नीले कागजों को चबाती सीक्या मुझे भूल जाओगी
क्या नहीं सोच पाओगी?कि मैं एक पेड, बूढा होता पेड
झुर्रीदार चेहरे वाला पेड्क्या अब काम का नहीं रहा?
सोचो और फिर सोचोदेता हूं आज भी छाया
देता हूंढेरों मुफ्त ईंधन,देता हूंसाफ शुद्ध हवा
देता हूं बसेराअनेकों पक्षियोंकोऔर तो बाहें फैला बनताहूं तेरा सहायक
और करता हूंपुख्ता हर क्षण तेरा विश्वासकि मैं जिन्दा हूं।
सोचो और फिर सोचोयदि कर भी दिया मेरा सौदा
तो देख पायेगी मेरा कटना नजरें चुरा पायेगी मेरे बहते लहू से
नहीं न, फिर क्योंनही बनी रहती वही जो पहले हुआकरती ठी
मोम सी सम्वेदन शील । व्यस्तता केक्षणों से कुछ पल चुरा
आजाया कर यूं ही , छू लिया कर यूंहीऔर दे जाया कर
मुझे एक विश्वास, कि अब भीकोइ मेरा है जो अपने स्पर्श से
जिला सा जाता है मुझे।गा

Tuesday, August 4, 2009

बदरंग होते कच्चे धागे

कल राखी है भाई बहिन के पवित्र और प्यारे से बन्धन का प्र तीक राखी ।बहिनें अपने भाई की कलाई सजाने के लिये बाजार से चुन -चुन कर राखी खरीद रही है और भाई भी अपनी बहिनों के लिये हाईटेक गिफ्ट खरीद रहे हैं।इतना ही नहीं धर्म भाई और धर्म बहिनों के मन में भी ढेरों उत्साह हैकर्मवती और हुमायु की पर्म्परा को जीवित जो रखना है।सब कुछ तो ठीक ठाक चल रहा था फिर अचानक समाज में एतना बडा परिवर्तन क्यों आया कि भाई बहिन जैसे पवित्र रिश्ते पर भी कालिख पुत गई बहिनें अपनेसुहाग भी भाई के रूप में ढूढने लगी और भाई शब्द की पवित्रता पाप के घेरे में आगई । हार की जीत कहानी में सुदरशन बाबा भारती से कहलबाते हैं खडग सिंह घोडा तो लेजाओपर इस बात का पता किसी को न लगे अन्यथा लोग गरीवों पर विश्वास करना छोड देंगें
आज समाज का जो पतन हो रहा है आखिर उसका जिम्मेबार कौन है? क्या हमारे अनुशाशन में कोई कमी रह गई है अथवाएडवांस बनने की चाहत में हम अपने सांसक्रतिक मूल्यों को भूलते जा रहे हैं। पता नही यह पतन कहां जाकर गा? सुनने में तो यह भीआरहा है कि पहले भी सब कुछ होता था पर पर्दे के पीछे। नजानेकितने अवैध सम्बन्धों की दुनिया समानांतर चलती रहती ठीक और थोपे गये सम्बन्धों को भी बेमन से ही सही निभा दिया जाता था। शायद तब सच का सामना करने की इतनी ताकत् नहीं रही होगी।सांप भी मर जाता था और लाठी भी नहीं टूटती थी। समाज की व्यवस्था भी बनी रहती और उन सम्बन्धों का निर्वाह भी चोरी छिपे होजाता था। सवाल यह नहीं कि ये सब बहुत कम होता था। मेरा मानना है गलत तो गलत होता है चाहे वह पर्दे के पीछे होअथवा खुले में। क्या ये सम्वन्ध अचानक वट् व्रक्ष बन जाते है अथवा छोटी- मोटी मुलाकातोंको हम नजर अन्दाज कर देते हैं ।ये भी हो सकता हैकि हम अपने वार्ड पर आंख मूंद कर भरोसा कर बैठ ते है हम उन्हें इतना बडा मान लेते हैकि वे सब कुछ सही कर रहे हैं।क्या प्रेम अर सच्छा प्रेम केवलपाक र ही पूरा किया जा सकता है इसके अलावा और कोईरास्ता शेश नहीं बचता। नये जमाने ने हमेंक्या कुछ दिया यह तो गणना का विशय है पर इतना तो निश्चित है कि हम अपनी ही आंखों मेंइतना गिर गये है कि इन सम्वन्धों को अनदेखा कर छोड देते है और बहुत से बहुत अपने को चुपा लेते है क्योंकि जानते है कि नये जमाने में वही सच होता है जिसे हम सच मान चुके होते। पर आंख बन्द कर लेने से अथवा अपने को छुपालेने से सम्स्या का समाधान तो नहीं हो जाता।है

Friday, July 31, 2009

जाना मां का

धीरे धीरे अगस्त भी आ गया। मा पिछले साल इन दिनों अकसर बीमार रहा करती थी।लेकिन उतनी बीमारी में भी अपने सभी बच्चों के लिये उसकी चिंता उसी रूप में बरकरार ठीक जैसे हम आज भी छोटे से नन्हे मुन्नेहो ।हर क्षण
अपने सभी बाल गोपालों की खबर सुध लेती रहती।और जब खुद उसे दुनिया छोडनी थी तो हम सभी को खाने पर भेज दिया छोटी से भी तुतते स्वर में बतरा ली और खुद अपनी आखिरी सांसोको छोडते वक्त उतनी ही मौन बनी रही जैसे वहअक्सर रहा करती थी। जब तक मां रही मुझे कभी उन पर लिखने की जरूरत ही महसूस नहीं हुई।बस मां ठीक तो मैं सब विषयों पर लिखना सकती ठीक सिवा मां के। मेरी हर रचना की पहली पाठक और श्रोता वही रही।कभी मैंने उन्हें सुख में उछलते और दुख में जार -जार रोते नहीं देखा। सब कुछ कितनी सहजता से लेती रही।
कभी मैं उनको अधिक खुशी में भी सामान्य व्यवहार करते देखती तो कहना शुरु कर देती कितना भी पदं लो, कितने भी इनाम जीत कर आओ कभी भी खुश नहीं होती और मां हमेशा की तरह सौम्य मुसकान बिखेरती धीरे से कह्ती बेटा ये जिन्दगी की सामान्य बातें है उन्हें इसी तरह लिया कर।जब पिचली जुलाई में मुझे प्रोफेसर का पद मिला तो श्हयद पहली बार चहक कर बोली ठीक चल तुने अपने पिताजी का सपना पूरा कर दिया। पता नहीं अपनी इस संतान में उन्हें क्या नजर आता वह अक्सर मेरे विद्यार्थियों में महादेवी के घीसा तो कभी गु6गिया को डूढ लेती और मेरे भविश्य में महादेवी की कल्पना करने लगती। शायद मां अपनी संतान को लेकर ऐसा ही सोचती हो।सच पूचे तो मुझे उनके बताये प्रसंगों ही अपनी रचनाओं के अनेकों पात्र मिले। आज जब मां का मेरे बालों को सहलाता हाथ नहीं हैं पर मेरे पूरे जेहन में मां आज भी साकार हो उठी है। मेरे हर कष्ट में उसकी सौम्य मुर्ति मेरी आंखों के सामने आजाती है और मैं फिर से चार्ज हो जाती हूं। अज मुझे मां की बहद याद आरही है बस मैंने अपने को आप सबके साथ बांट लिया।

Saturday, July 25, 2009

रिश्ते

न जाने क्यों बदल जाते है रिश्ते
पल और क्षण में
और मैं बाबरी सी उन रिश्तों की याद में
खोई -खोई सी न जाने क्यों
उस जगत में घूम -घूम आती हूं
पढते हुये तसलीमा के फेरा को
सोचा भी न था कि कल मैं भी
फेरा की कथावस्तु को दुहराती सी
अपने बचपन और अपने बच्चे की
तुतलाहट भरी यादों को मन ही मन
गुनगुनाउगी,बोलूंगी ,बतराउगीं
कभी मन भटकता है पिता के
लगाये पीपल,सरिस और जामुन में
तो कभी भरती हूं उडान शिशु की
अठखेलियोंकी,मा तू सबसे प्यारी है नुमा वाक्यों की
और अब समय हाथ से फिसलता जा रहा है
पैरों तले गीली बालू भी सरक रही है होले-होले
फिर भी जिन्दा हूं कि रिश्ते कभी मरा नहीं करते
केबल रूप बदला करते है।















न में

Thursday, July 23, 2009

बचपन् मासूम

अपनी संस्था प्रयास में पढाते हुए मुझे बहुत ही रोमांचक अनुभव हो रहे हैं। एक भी बच्चा ऐसा नहीं है जो पढ्ना नहीं चाहता हो। बस सबके सीखने की गति और तरीका अलग -अलग है।किसी को केबल लिखना पसन्द है तो कोईखुउब बोलना चाहता है। किसी को दीदी को छूना अच्छा लगता है तो कोई अपने नई फ्राक दिखाने के लिये इतना उत्सुक है कि जब तक उसकी बात सुनाओ न ली जाये वह पढने के लिये तैयार ही नहीं होता। सोनिया लिखने में कुछ कच्ची जरूर है लेकिन जब उसे खेलने के लिये खिलौना दिया गया तो एक अच्छे नेता की तरह उसने सभी बच्चों को खेलने का अवसर दिया और सबको अनुशासन में रखे रही।मुस्कान सबकी कोपी इक्कठे करने का काम बखूबी कर लेती है। ये बच्चे चोरी करना नहीं जानते पर जो उन्हें पसन्द आजाता है उसे बदे भोलेपन से ले लेते हैं और पूछने पर उतनी ही मासूमियत से स्वीकर भी कर लेते हैं हां दीदी मैंने उसकी चीज लीहैपर चोरी नहीं की हैऔर तो इनके शब्द कोश में झूठ बोलना भी नहीं हैं पर डांट से बचने के लिये और अपनी बडी दीदी के सामने अच्छा बनने के लिये ये सही बात नही बता ते ।जब उन्हें यह विशवास दिलाया जाता हैकि जो भी तुमने किया है बता दो , कोई कुछ नहीं कहेगा तो ये मासूम अपनी तोतली जुवान में सब कुछ बयान कर देते हैं।मैंने अक्सर पाया हैकि वे अपने को सबके सामने अच्छा दिखाना चाहते हैं। उन्हें बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता है जब आप उसे नजर अन्दाज कर देते है और उसके मित्रों के सामने उसकी कमियों को उजागर करने लग जाते हैं।आलोचना औरकमियां गिनाने से उसमें कोइसुधार तो सम्भव नहीं होता ।हां मन में हीनता की भावना और बदला लेने की भावना अवश्य आजाती है।बच्चो को पढाते समय बेहद साबधानी अपेक्षितहै।बाल मनोविग्यान का ग्यान बहुत सहायक है।ये वेबच्चे हैं जिन्हे यदि किसी गलत हाथों में सौंप दिया गया तो उनका पूरा भविश्य चौपट हो जायेगा।अपने बच्चे के लिये अध्यापक चुनते समय इन छोटी बातों को नजर अन्दाज कभी भी ना करें।।

Thursday, July 16, 2009

जिन्दगी

गडबडाती जिन्दगी के लडखडाते पहिये

हर कदम पर ठोकर से आहत हो,
सवालिया नजरो सेमुझसे मुखातिब होते हैं।
हकला- हकला कर एक ही बात दुहराते है
आखिर उन्हें बदल क्यों नही जाता?
या रास्ते की ईंट पत्थरोंको सलीब पर लटका क्यों नहीं दिया जाता?
मैं पहियों की सबालिया नजरोंसे निगाहें मिला नहीं पाती

अपनी ही नजरों में गिरती,न तो पहिये बदल पाती हूं

और न ठोकरी ईंटो को सलीब पर चडा पाती हूं
विवश होती,उन्ही पहियों की गाडी को
खुरदरी सडक पर ,डगमगाने के लिये छोड देती हूं।















Monday, July 6, 2009

मेरी मां

घटनाक्रम कुछ जीवन के प्रेरित हमको कर जाते है
कुछ काव्य कहानी रचना पर मज्बूर हमें कर जाते हैं।
कुछ घट्नाए यूं तो साधारण पर कभीऐसी घटती,
जाने अनजाने वो हमको सिर से पांव तक छू लेती
कुछ हर्षमयी घटनाएं तोआंखों से नीर झलकाती है,
होते हैं हर्षित देख-देख जीवन के उस प्यारे क्षण को
कटु सत्य कभी विस्मृत होते दर्शनकर उस हर्षित क्षण को ।
है बात पुरानी नहीं बहुत मां ने मेरी समझाया था,
जब साथ मिले पुष्पों का तुम्हेंकांटों को मत विस्मृत करना
यदिपुष्प सुरभि से भरे हुएकांटे भी उनका एक भाग,
जैसे कोई तुमको पूछेऔर छोडे उस वस्तु का साथ
जिसने पहुंचाया मंजिल तक जीवन में तुमको बार -बार
और कहा पिताश्री ने था मुझे,रखती जिसको मैं सदा याद
कुछ बातेंऐसी होती हैंजो अंतस्थल छू लेती हैं
पर बहकर के भावुकता में,कुछ कर्म न ऐसा कर जाना
पछ्ताओ जिसको स्मरण कर,जीवन में फिर बार- बार
ये सुन्दर सार भरी बातें,विस्मृत कैसे कोई कर दे
कुछ छिपे अर्थ जो बता रही,सुन्दर जीवन जो बना रही

अनुपम सारस्वत के सौजन्य से



















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Sunday, July 5, 2009

आया सावन झूम के

कल से सावन लग रहा है और सावन के ढेरों गीत मेरे जेहनमें गूंजने लगे हैं। मां के घर में पीपल और सरिस के पेड पर मोटी रस्सी का डलता झूला.ऊंचे-ऊंचे झोटे लेते और रिम्झिम फुआरों के बीच सावन कीमल्हारें गाती हम बहिनें और हमारी सखियां।सच में वह सब मैं कभी भी नहीं भुला पाती।आज मां-पिता तो नहीं रहे पर पीपल और सरिस के बूढे होटल पेड आज भी अपने आंचल में हमें लेने के लिये बेताब हैं।सावन हमेशा से बहिन -बेटियों के लिये ढेरों सौगातलेके आता है।हरियाली तीजें,नाग पच्मी, और भाई-बहिन का प्यारा सा त्योहार राखी।हर सुबह एक नई उमंग. घर कमें बनते ढेरों पक्वान,पूएऔर खीर।हाथों में रचती मेंहदी और सुबह उठते ही यह होड कि किस्की मेंहदी अधिक अच्छी रची है।
अरी मेरी बहिना सातों सहेली चलो संग झूला पे चल के झूल ले, तो कभी मेंहदिया के लम्बे चौडे पत्ता ,पपीहा बोले।कबी गोबर्धन को बीजना हरियाली तीजें आयेंगी,तो कभीराधा किशन के गीत।आधी रात तक झूलने के बाद भी मन नहीं भरता था।मां आस्पास के घरों में भी झूलने का न्योता भिजबा देती।हमारा पूरा घर भरा- भरा लगता और हम बच्चे सावन की बूंदों में भीगने का आनन्द उठाते रहते।
कहने को तो आज भी हरियाली तीजों पर हरे रेंज की साद्यों की नुमायश होती है पर अब सब कुछ हाईटेक हो चुका हैआज मुझे लगने लगा है कि जो भी शेश बचा है उसे कस के पकड लूं कहीं सब कुछ हाथों से फिसल ना जाये

Tuesday, June 30, 2009

मेरी कविता

क्यों होती है एक औरत रोज-रोज परेशान

क्या उसे हक नहीं होता अपनी जिन्दगी जीने का?

क्यों एक आकार नहीं ले पाते उसके अपने सपने?

क्यों हर कदम पर उसे एक -एक इंच बढ्ने से पहले 
सोचना होता है कई-कई बार?

क्योंउसकी जिन्दगी के फैसले दूसरों की स्टाम्प के होते है मोह्ताज?

आखिर क्यों और क्योंहोता है ऐसा?

पढ्ते हुए ढेरों-ढेरों पन्ने किताबों के

देखते हुएहजारों सच्ची घटनाओंको

अब लगने लगाहै

होता है ऐसा

क्योंकि औरत कभी नहीं चुनती अपना जन्म

कुछ और की आस में पलती रहती है नन्हींजान

और जब आती है इस दुनिया में

ढेरोंविसंगतियोंका शिकार होकर

अपनी जिजीविषा के बल पर

चुनौतियों का सामना करती जातीहै

चलती जाती है अपनी उस मंजिल पर 
जिसे उसने कभी चुना ही नहीं होता

बस अपनों की खुशियों की खातिर

हर मुसीबत को झेलती कभी उफ तक नहीं करती

पर वही अपने जब देते हैं दगा

कर देते है उसे यूंही बदनाम

तो वह टुटती ही जाती है और एक दिन
बिना किसी शिकवा-शिकायत के 
 सब कुछ छोड चल देती है फिर किसी को खुश करने

क्योंकि उसका जन्म ही

दूसरोंकी इच्छा पर निर्भर होता है

और इतना ही नहीं अब तो उसकी मौत भी 
दूसरे हे तय करने लगेगी है।

-- 
Dr.Beena Sharma
http://prayasagra.blogsp

पूर्णिमा

कहने को तो पूर्णिमा बाजपेई इस कहानी की नायिका है, पर र्मैं उसे नायिका कैसे मान सकती हूं।मुझे तो हर दो की गिनती के बाद तीसरी लड़्की पूर्णिमाही नजर हीआती है।पूर्णिमा पूर्णिमा न होकर अनुराधा,योगदा,सलेमा,भाग्यश्रीया उपासना जो भी होती और बाजपेयी,न होकर वर्मा,सिंह,देका राभा,रेड्डी जो भी होती तो क्या उसकी जिन्दगी की किताब किसी और रंग से लिखी जाती।पर एक घटना को कहानी का रुप देने के लिये मैं उस बच्ची का नाम पूर्णिमा रख लेती हूं।

  हांपूर्णिमा मेरी बहिन थी,प्यार से उसे हम पुनिया कहते थे।सामान्य बुद्धि की बच्चीऔर भाई-बहिनोंजैसी उच्च शिक्षा तो न ले सकी,पर घरेलू कार्यों और व्यवहार में हम सबकोमात देती थी।विषयोंकी सैद्धांतिक जानकारी देतीमैं उसे विग्यान और गणित के सूत्र तो रटाती रही,,अंग्रेजी व्याकरण के टेंसों ों में उलझाये रही पर जीवन को जीने के दो चार गुण सरल भाशा में न समझा पाई।जो कुछ उसके पास था हम बड़े उसेजान ही न पायेे,अपने बड़्प्पन का लोहा ही मनवाते रहेऔर बात -बात में उसे बुद्धू करार देकर उसकी क्षमताओं को नजर अन्दाज करते रहे ।वह जैसी थी,हम उसे स्वीकर नहीं कर पाये और छैने हथोड़ा लेकर,दूसरों के जिन्दगी से उदाहरण ले -लेकर उसे मूरत की तरह गड़्ने की कोशिश में लगे रहे ।हर वक्त की आलोचनाओऔर् उपेक्षाओं के कारण बालमन इतना कुन्द हो गया कि विवाह के पश्चात उसेजो थोडी बहुत अवांछित् स्वतंत्रता मिली ेउसे वह स्वर्गिक सुख मान बैठी।सही गलत समझने की शक्ति तो उसने कहींउठाकर रख दी थी।चमकते बर्तनो में चेहरे की चमक् ढुंढती मेरी पुनिया अपना दर्द सीने में दबाये ,सिर बांधेपडी रही,सब कुछ सहती रही,पर मुख पर मुस्कराहट का मुखौटाा ओढे रही।
 जब तक उसने स्थितियों को समझना शुरु किया ,बात हाथ से निकल चुकी थी।मां के परिवार मेंउसकी आलोचना के मूल मेंउसका हित होता था,पर यहां उसकी सिधाई का शोषण शुरु हो गया था।पति के रुप मेंउसे ऐसा दरिन्दा मिला जौसे न मरने देता था न जीने ।उसकी भावनाओं को ब्लैक मेल किया जा रहा था।न जाने कितनी लिखित तहरीर ठीक जो उसने प्यार के आगोश में लेपुनिया सेे लिखबा ली थी।
भोली बच्ची उस नाटकबाज के ढोंग को प्यार समझती रही,उसपर अपना सब कुछ लुटाती रही।और वह लुटेरा अपना मतलब साध बहुत जल्द उसे दूध में पडी मक्खी की तरह निकाल चुका था।तब उसके सिर बांधे पड़े रहने का औचित्य मेरी समझ से बाहर था। हर बार मां-बापु से कहती-इतने बैभव में भे पुनिया पनप क्यों नहीं रही है?" अब लगता है बचपना तो उस समय में कर रही थी,जो पुनिय के सुख को घर के पर्दों,सोफों,साड़ियों की गिनती और जेवरों की चमक में तलाश रही थी। जब तक असलियत जान पाई,बहुत देर हो चुकी थी।मेरी बच्ची जैसी बहिन एक दरिन्दे के हाथों की कठपुतली बन चुकी थी।

योजना के अनुसार जब वह दरिन्दा ढील छोड-ता और पुनिया उसकी मांगों को लिये हमसे मिलती तो हम््पुनिया की कुशलता एक दो वाक्यों में पूछ अपने कर्तव्य की इतिश्री मान बैठते थे-पुनिया तू कैसी है,तेरा सल्लू कैसा है,राजा बेटा कैसा है? बस और हमारे प्रशनोंके उत्तर मेंवह सिर्फ मुसकरा देती थी।पीडा से भरी उस मुस्कराहट को हमने बहुत हल्के ढंग से लिया था।मां ने जब भी अपनी इस संतति को लेअपने चिंता जताई तो सभी ने यह कहकर उनका मुंह बन्द कर दिया,"अरे थोडी बहुत ऊंच नीच तो हर लड़्की के साथ लगी रहती है।हर लड़्की को को थोड़े बहुत दबाबों का सामना तो करना पड_ता है।"जब -जब् उससे मिलना होता ,मुलाकात नितांत औपचारिक हुआ करती थी।न वह अपना मन खोलती और हम अपनी व्यस्तताओं के घेरे मेंकेवल सामाजिकता का निर्वाह भारत कर देते थे ।जीवन की उंच -नीच और संघर्षों से डरती बच्ची इतना चुपा गई थीकि कभी अपने को किसी के आगे खोलना उसने मुनासिब नही।समझा।कह भी लेती तो हम क्या तीर मार लेते ।उसकी जिन्दगी के किस-किस मौड़ पर हाथ लगा लेते ।नितांत गोपनीय क्षणोंों कादमन वह किस् -किस को सुनाती।क्या सबसे यह कहतीकि पेश मुझसे अपना सुख लूट्मुझे खोखला कर रहा है।मेरी मर्यादा की उसकी निगाह में कोइ कीमत नहीं है,मैं उसके हाथों क खिलौना भारत हूंजिससे जब चाहता है खेलता है और जब चाहता है पटक देता है।हां,उस भूखे भेड़िये ने संतति को अपने कब्जे में कर उसे े पागल करार दे दिया था।पुनिया की लिखित तहरीरें अब उस दरिन्दें के काम आ रही थी।
 इन तर्कों के आधार पर उसे े पगली बता तलाक लेने की योजना बना ली।पहला कदम पुनिया को उसके मां-बप के घर पटकना था।संतति छीन ली गई,ढेरों आरोप लगाये गयेऔर बहुत कम बोलने बाली पुनिया को कोर्ट -कचहरी में ला खडा किया गया।बूढे मां-बाप सीमित साधनों में इस जंग के मोहरे बन गयेऔर पुनिया इतनी थुक्क्म -फजीहत के बाद भी इक टूटी आशा लिये रहीशायद मेरा पति, मेरा देवतामुझे अपने घर के एक कोने मेंपडा रहने देगा,जिससे मे री जिन्दगी गुजर जायेगी।पर कहां हो पाया ये सब?इस लम्बी लडाई में सब अपना- अपना हित देख ते रहे।सम्बन्धी अपनी सुरक्षा के लिये चिंतित थे,सबको लग रहा था कहीं यह आफत हम पर न आजाये।एक दो जो हिम्मत जुटा कर खडे थे,ढेरो6 आलोचनाओं का शिकार होकर बार-बार गिरते मनोबल के साथ दूसरी पंक्ति में मिलने को तैयार हो जाते थे।किस मुशकिल से संभली थी सारी स्थितियां।

अथक प्रयासों के बाद पुनिया के हाथ ्केबल इस जंजाल से मुक्ति लगी थी।उसे खुश होना चाहिये था,पर इतनाकुन्द मन और थका शरीर लिये उससे खुश भी नहीं हुआ गया।जिस दिन सम्बन्धों के टुटने के समाचार पर सरकारी स्टाम्प लगी,पुनिया को अतीत रह -रह याद आया था।पुनिया ने बिस्तर पकड लिया था। हम उसे तन का कष्ट मान डाक्टरोतक दौडते रहे,नये-नये खिलोनों से उसका मन बहलाते रहे,पर वह तो जैसे बिल्कुल चुपा गयी थी।कभी बाजार भी जाती तो अपनी टूटी ग्रहस्थीके अंगो-उपांगों की साज-सज्जा की मांग धीमे स्वर मे रखतीऔर हम बडेउसका तुरंत विरोध कर -वहां सब खत्म हो चुका है,अब उस विशय में कुछ मत सोचो-कह कर उसे मौन कर देते थे।पर क्या निर्देश देकर आन्दोलित मन में ठहराब लाया जा सका?अन्दर ही अन्दर घुलतीपुनिया एक दिं न बिना कुछ्कहे बीमारी की आड मेंहम सबको छोड् गयी,सबको मुक्त कर गयी।कितने चिंतित रहा करते थे हम उसके भविश्य के लिये,इसका क्या होगा कैसे होगा,पर उसने हमें कुछ भी कहने-सुनने के लिये मौका नहींदिया।जब तक रही,एक कठपुतली की तरह जिन्दा रही।कहा तो खालिया,जागो तो जाग गई सो जाओ तो सो गयी-सब कुछ रिमोट वत करती रही।

अब उसका बचपन रह-रह याद आता है।सिर मेंदूसरे बच्चे के द्वारा कंकड मारे जाने पर बहते खून को अपनी फ्राक में चुपाती पुनिया बडे होने तक अपनी इस प्रव्रति को भूली नहीं।जो भी दुख मिला उसे स्वयम मेंचिपा पीती गई।कभी लगता था स्थितियां इसी के कारण बिगड रही हैं,पर वह कभीमूल में थी ही नहीं।जो जो उसने चाहा,उसके लिये संघर्ष चाहिये था।आसुरी शक्तियों से संघर्ष तो विरले ही ले पाते हैंफिर उसने तो कभी अपनी छिपी शक्तियों को पहचाना ही नहीं।

क्यों किया पुनिया तुने ऐसा?एक बार तो उठ कर खडी हो जाती,कहींएक व्यक्ति केजीवन से हटने से सब कुछ्समाप्त हो जाता है?अपना मनोबल ऊंचा रखतीपुनिया,तो तुझे वह सब मिलता जिसकी तू हक्दार थी।तूने एक कदम पीछे हताया तो दुनिया ने तुझे सौ धक्के और दिये। मेरा मन बार-बार धिक्कारता है,क्यों मैंपुनिया में आत्मविश्वास नहीं जगा पाई?मेरी पुनिया तो चली गई,पर अब कोशिश है कोइ और बच्ची पुनिया सा जीवन बिताने पर मजबूर न हो।बिगड्ती स्थितियों मेंनियति को दोशी न ठहरा कर हाथ पैर चलाये जायें,सम्भव है कुछ प्राप्त हो जायेऔर प्राप्ति न भी हो तो कम से यह संतोश तो रहे कि हमने कोशिश तो की थी।पुनिया:मेरा भी वादा है तुझसे कि मैंअब किसी बच्ची को पुनिया बनने से रोकने की कोशिश करूगीं।यही मेरी श्रद्धांजलि होगी तेरे लिये।

 


-- 
Dr.Beena Sharma
http://prayasagra.blogspot.com/

Monday, June 22, 2009

लो कहां आ गये हम्

हम पांच बहिनों और भाई की शादी की एक- एक रस्म मुझे मुंह जबानी याद है।उन 

दिनोंशादी के नाम पर घर रिश्तेदारों से भरा-पूरा रहता था। शाम होते ही घर की 
लड़कियां और बहुएं ढ़ोलक की थाप के साथ गीत गाना शुरु कर देतीऔर देर रात तक नाच-गाने का कार्यक्रम चलता रहता।और गाने भी देशी,वरना,वरनी,भात,घोड़ी,ढोला,रजना और बड़ी-बूढियों के गीत। इन गानों में घर के सभी रिश्ते-नातों का जिक्र होता था।
विवाह की शुरुआत दीदी या बुआ के देहरी सिरांने से होती थी।उन लोगों के द्वारा लाई गई मिठाई अपने परिचतोंऔर रिश्तेदारों के यहां बांटी जाती थी।उन दिनों भी नाउ और नाइन होतेहोंगें पर हम घर के छोटे बच्चे इस काम को खुशी- खुशी करते थे।आखिर हमारे भैया या दीदी की शादी जो थी।महीने भर पहिले ही हम बच्चों के लिये नये कपडे बनने शुरु हो जाते थे। लगन से पूर्व घर में गेहूं. साफ करने और मसाले पीसने का कार्य शुरु हो जाताऔर मोहल्ले की चाची,ताई, भाभी सभी इन कामों में बद-चढ कर भाग लेती।हर कार्य मंगल गीतों के साथ सम्पन्न होता था।लगन वाले दिन गाया जाने वाला “रघुनन्दन फूले ना समाय लगुन आई हरे हरे मेरे अंगना”आज भी उसी जोर- शोर के साथ गांव –देहातों में सुनने को मिल जाता है। वरनी गाते समय माहोल इतना कारुणिक हो जाता था कि लाडो और मां की आंखों से बहते आंसू सबको रुला जाते थे। सात या पांच दिन की लगुन हम बच्चों के लिये ढेर सारी खुशिया लेकर आती।किसी दिन हल्दी और तेल के गीत तो कभी घूरा पूजने की रसम ,कभी बूढे बाबू की पूजा तो कभीकुम्हार को बुलाकर लाना।कभी रतजगा तो कभी भात के गीत ।कब रात होती और कब सबेरा ,कुछ ध्यान नहीं रहता था।बस एक ही धुन ,एक ही खुशी कि हमारे घर शादी है।उन दिनों मुझे बडी-बूढियों के गीत कभी समझ नहीं आते थे बस एक आलाप सुनाई देता और शब्द कहीं खो जाते। समझदार होने पर पाया कि असली गीत तो वही होते थे। उन गीतों की एक बानगी यहां दे रही हूं-द्रष्टव्य हो कि ये गीत माता और पिता के सभी रिश्तों का प्रतिनिधित्व करते थे। जब मां ने मुझे विवाह सम्बन्धी गीत सिखाये तो मैंने रिशतों का इक क्रम अपने जेहन में सुरक्षित कर लिया और वह आज तक याद है।सबसे पहले बाबा-दादी,ताउ-ताई,पापा-मम्मी,चाचा-चाची,भाई-भाभी,बुआ-फूफा,नाना-नानी,मामा-मामी और सबसे अंत में मामा-मामी।लगभग सभी गीतों में इन रिशतों काजिक्र होता था।मेरा बाल मन कभी विरोध करता था कि मेरे सबसे अच्छे नाना-नानी का नाम सबसे बाद में क्यों लिया जाता है।खैर अब तो सब समझ आगया है। उस समय फिल्मी गीतों के आधार पर ये गीत नहीं गाये जाते थे। -माढे के बीच लाडो ने केश सुखाये।बाबा चतुर वर ढूढों,सयानो वर ढूढो, दादी लेगी कन्यादान , लाडो ने केश सुखाये।
इसी तरह सभी रिश्तेदारों के नाम लिये जातेहैं।एक और गीत है-मेरा सीकों काघरोंदा रे , बाबुल चिडिया तोडेंगी तेरा आंगन सूना रे ,बाबुल मेरे जाने से और फिर पिता का उत्तर मेरी पोती खेलेगी, लाडो घर जा अपने। तेरी गलिया सूनी रे, बाबुल मेरे जाने से तेरी सखिया खेलेंगी, लाडो घर जा अपने तेरी बगिया सूनी रे, बाबुल मेरे जाने से तुझे सावन में बुलाय लुंगा,लाडो घर जा अपने। भाई के द्वाराबहिन के बच्चों की शादी में जो सहायता दी जाती है, उसे ही भात देना कहा जाता है।शादी –विवाहों में सर्वाधिक गाया जाने वाला भात है- बहना चल मन्ड्प के बीच, अनोखा भात पहनाउंगा
सास तेरी को कोट पेंटऔर टाई लगाउंगा
ससुर तेरे को साडी जम्पर चुनरी उडाउंगा आगे इसी तरह जेठ –जिठानी.देवर-दौरानी,ननद-ननदोई के नाम लिये जाते है।
लगभग सभी गीतों में कन्या और वर पक्ष के माता-पिता, भाई- भाभी,बहिन-बहनोई और सभी रिश्तों को आधार बनाया जाता है।ये गीत कहीं न कहीं कन्या और वर को इन रिश्तों की अहमियत बताते हैं।विवाह के समय सम्पन्न की जाने सभी रस्में जीवन की व्यावहारिक समस्याओं से जुडी हुई है।पर आज का परिद्रश्य बिल्कुल बदला हुआ है।शादी को दो परिवारों का बन्धन नहीं, केबल दो और नितांत दो व्यक्तियों का आपसी समझोता मान लिया गया है।शादियों मे होने वाले महिला संगीत का रूप बिल्कुल बदल गया है।केवल कुछ प्रोफेसनल द्वारा गाना बजाना होताहै,फिल्मी गीतों पर बच्चिया न्रत्य करती करती है।इन गीतो और न्रत्यों में लोक तो इतना धूमिल हो गया हैकि ढूढने पर भी नहीं दिखता।
इस सबका परिणाम यह है कि रिशते अपनी गरिमा खोते जा रहे है।आपासी तनाव और वैमनस्य बढ रहे हैं।अभ भी समय है कि इन पुराने रीति- रिवाजों और गीतों को न केवल सुरक्षित रखा जाये बल्कि इन गीत और लोक्ंरत्यों के निहितार्थोंको समझा जायें।जिसके पास जो कुछ भी है वह नयी पीढी को इन सबसे परिचित करायेऔर इसके महत्व को रखांकित करें।हो सकता है हमारा ये गिलहरी प्रयास संसक्रति संरक्षण में कोई चमत्कार दिखाजाये।

Thursday, June 11, 2009

औरत तेरे रूप अनेक

मां जब मुझको कहा पुरुष ने,तुच्छ हो गये देव सभी

इतना आदर इतनी महिमा,इतनी श्रद्धा कहां कभी

उमड़ा स्नेह सिन्धु अंतर में,डूब गई आसक्ति अपार

देह गेह अपमांन क्लेश छि:.विजयी मेरा शाश्वत प्यार

बहिन पुरुष ने मुझे पुकारा,कितनी ममताकितना नेह

मेरा भैया पुलकित अन्तर,एक प्राण हम हो दो देह

कमल नयन अंगार उगलते हैं,यदि लक्षित हो अपमान

दीर्घ भुजाओंमें भाई की,रक्षित है मेरा सम्मान

बेटी कहकर मुझे पुरुषने दिया स्नेह अंतर सर्वस्व

मेरा सुख मेरी सुविधा की चिंता,उसके सब सुख ह्रस्व

अपने को भी विक्रय करके ,मुझे देख पाये निर्बाध

मेरे पूज्य पिता की होती, एक मात्र यह जीवन साध

प्रिये पुरुष अर्धांग दे चुका,लेकर के हाथों में हाथ

यही नहीं उस सर्वेश्वर के निकट , हमारा शाश्वत साथ

पण्या आज दस्यु कहता है, पुरुष हो गया आज पिशाच

मैंअरक्षिता,दलिता,तप्ता,नंगा पाशबता कानाच  

धर्म और लज्जा लुटती है,मैं अबला हूं कातर दीन

पुत्र ,पिता,भाई,स्वामी,सब तुम क्या इतने पौरुष हीन

Monday, June 8, 2009

मन एक पारसमणि है।

जितम जगत केन,मनोहियेन,यजुर्वेद के इस मंत्र का अर्थ है जो मन को जीत लेता है वह सबको जीत लेता है।कृषण अर्जुन से कहते हैंमन बहुत चंचल होता है।यह मन एक कल्पवृक्ष की तरह होता है।इसके नीचे बैठ कर जो भी कामना की जाती है, वह पूरी होती है।जब मन प्राथना मेंनही होता, तब प्रार्थना बेकार हो जाती है।मन को अभ्यास और वैराग्य से वश मेंकिया जा सकता है।स्वामी विवेकानन्द कहते हैं"मन जितना निर्मल होगाउसे वश मेंकरना उतना ही सरल होगा।मनुश्य का स्वास्थ्य उसकी अंतर्मन की स्वास्थ्य सम्बन्धी उत्तम भावना पर  निर्भर करता है।

आज जिस प्रकार का जीवन मनुश्य जी रहा है,उसमे मनुश्य को तनाव मेंरखने वाले दर्जनोस्रोत है।इस तनाव मुक्ति के लिये इन उपायोंको किया जा सकता है-

हंसे और प्रसन्न रहे।

लीक से हटिये।

अतिरिक्त वाश्प निकलजाने दें।
चिंताओ को एक सीमा मेंरखें।


दूसरोंसे अपना ताल्मेल बिठाये।

मन को अनाव्रत करें।

शिथिलीकरण तनाव दूर करने का सरल तम उपाय है।

मन को अपने अनुकूल आचरणकरने के लिये बाध्य करें।

              ये कुछ छोटे-छोटे उपाय हैं जिनकोअपना कर्तनाव को कम किया जा सकता है।








Sunday, June 7, 2009

मेरी मां की साडी

जब हुआ हो उनमेंवैचारिक मतभेद

शायद तात ने खींची हो मां की साडी

जी हा ंमां की साडी, जो फट गई ठीक बेचारी

आये थे घूम पिता श्री 

मन में उल्लास भरा था
थे धूम्रपान के मद में

पकडी ठीक मां की सारी

जी हां मा की साडी ,जो जल गई थी बेचारी

दिया जन्म था हमको

हम आठों की  ही जननी

करते थे मूत्र विष्ठा भी

आधार थी मां की साडी,

जी हां मां की साडी,जो सब सहती थी बेचारी

थे उत्पात मचाते

हम बाहर जाना चाहते

रहती थी हमको जल्दी

भिगो पानी में पल्ला

मुख पोंछा था हम सबका

वह भी थी मां की साडी

जी हां मां की साडी,जो टोवल बनी बेचारी

निहित सभी था उसमें

जो कुछ भी उसने भोगा



प्रप्रेम समर्पण मुख्य ध्येय था

इच्छा अनिच्छा का प्रश्न नहीं था

चुप सहती थीबेचारी     

जी हां मा की साडी,जो पर्दा बनी बेचारी।

धोया था मां ने उसको फैलाया था आंगन में

हम खेल रहे थे छुपा-छुपी उसके ही मस्त गगन में

असीम प्रेम था उसका,वह भी ठीक मां की साडी

जी हां मां की साडी,जो सीमा हीन बेचारी

हो गई थी बहुत पुरानी

पर फैंकी नहीं गई थी

उससे बना बिछौना

सोयेगा नन्हा छौना

जो गद्दी बनी पडी थी

वह भी थीमांकी साडी

जी हां मां की साडी ,जो कल्पवृक्ष थी सारी।



Saturday, June 6, 2009

जीओ तो सकारात्मक सोच के साथ्

आज हम सभी चिंता और तनाव मेंघिरे हुए हैं।पूरी दुनिया के प्रति हमने नकारात्मक सोचअपनालियाहै॥सबबुरेहै,सबखराबहै, पता नहीं मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है,भगबान भी मेरी परीक्षा लेता रहता है, इतना करने पर भी लोग मुझे मान्यता क्यों नहीं देते आदि- आदि।इन सभी धारणाओं के साथ जीने से हम सबसे पहले और सबसे बडा नुक्सान अपना ही करते है। सब कुछ उतना खराब भी नहीं होता जितना हम सोच लेते है।अपनी असफलताओके लिये दूसरों को दोष देना बहुत सरल काम होता हैपर उन असफलताओ के कारणो का विवेचन करना हमारा पहला काम होना चाहिये।

सकारात्मकता बाबा के मोल नहीं मिला करती और न ही ये एक दिन मे उपजती है ।दर असल यह जीवन जीने की कला है।यदि किसी व्यक्ति के साथ हमें रहना ही है तो क्यों न हम उसके गुणों को खोजें वनसपत  हर समयछोटी
  छोती बातों को आधार बनाकर उसकी आलोचना ही करते रहे ं परेशानी आने पर अपने को कोसने लगना समस्या का विकलप नहीं हुआ करता।किसी  की कोइ भी समस्या इतनी बडी नहीं हुआ करती कि उसके पीछे जीवन को ही दांव पर लगा दिया जाये।किसी बात के छोटे -छोटे पहलुओं पर विचार करने से आधे समाधान हो जाते है।

सब कुछ अच्छा ही होगा इस भावना के साथ काम करने से मनोबल बढता है।अच्छा सोच आपके जीवन के प्रति दृष्तिकोण  को दर्शाता है।किसी से मिलने पर तीसरे की आलोचना करना यह दिखलाता है कि आप की वृत्ति  सबको क्रिटिसाइज करने की है। हम सबसे पहले अपने को देखना शुरु करें कि हमारे अन्दर क्या कमिया है और उन्हें हम कैसे दूर कर सकते है।अच्छे विचारो के स्वामी बनें और अपने नकारात्मक सोच को बदले।

Wednesday, June 3, 2009

अब क्यों नहीं होती गर्मियोंकी छुट्टियां?

अब क्यों नहीं होती गर्मियों की छुट्टियां?
जून की तेज गर्मी और याद आता है नानी के घर का बडा सा अहाता,मामा और मौसी के बच्चों के साथ मचाई धमा चौकडी,नानी का ढेर सा दुलार ,नानी से मां की शिकायते, पढाई लिखाई से पूरी तरह से छुट्टी।पहली जुलाई,रिचार्ज और रेफ्रेश हुए हम ,नई नई चमक दार किताबें,स्कूल का पहला दिन, सभी बच्चे अपने –अपने अनुभव सुनाने को बेताब ,बारिश के धुले –पुछे से चेहरेऔर मन में ढेरों उमंगें। और अब सत्र ही बदल गया।अप्रिल में ही शुरु होता नया सत्र,छु ट्टियों के लिये ढेरों होमबर्क् और कहीं बाहर जाने पर यह डर कि यदि होमबर्क पूरा नहीं हुआतो।आज के बच्चे नाममात्र की छुट्टी में भी समर केम्पों में व्यस्त हो गये है।इन केम्पो मेंफिल्मे गानों और न्रत्य की भरमार है।बच्चों से घर पूरी तरह छूट रहा है।उसे अचानक बडा मान लिया गया है।स्कूल ,ट्युशन/कोचिंग.स्पोर्ट्स ,स्विमिंग,औरभी न जाने क्या ।घर उसकी प्रतीक्षा नहीं करता।दो आतुर बाहें उसे अपने में समेटने को आगे नहीं बढती। देर रात पिता के आने से पहले ही वह निढाल होनों सो चुकाहोता है।दादी-नानी की कहानियों से मरहूम है वह।उसका भविश्य अंकों और डिवीजनों से आंका जारहा है। 
अब उसे अंत्याक्षरी में हिन्दी कवितायें,प्रार्थना,दोहे,चौपाई ,सोरठा,कवित्त,नहीं रटाये जातें।अपने आस-पास के वातावरण में बजते द्विअर्थी गीत उसकी जुबान पर चढ चुके है।जिन बातो का अभी बह अर्थ भी नहीं समझता,उन्हें बेहिचक बोल देता है। आखिर हम माता –पिता केबल स्कूलों की पढाई पर ही क्यों निर्भर है।इन छुट्टियों का उपयोग अपने बच्चों को कुछ नया सिखाकर क्यों नहीं कर लेते।हम बच्चों को ग्यान का बंडल तोजरूर थमा रहे है लेकिन जीवन में आने वाली व्यावहारिक परिस्थितियों से मुकाबला करना नहीं सिखा रहे।उसे सही बात पर स्टर्न रहना नहीं सिखा पाये हैं।यह तो सच है कि आज का बच्चा बहूत कुछ जानता है पर अभी सब कुछ सैद्धातिक समझ है, इन छुट्टियों हम उसे कुछ व्यावहारिक बातें बताना शुरु करेंऔर इस काम को माता-पिता खुड ही करें ,यह काम पैसे देकर दूसरों से नहीं करवाया जा सकता।

आओ एक कदम बढायें

  बच्चों को अधिकार दिलाये माताओं को हम समझाये पापाओं की क्लास लगायें 
  तारें जमीं पर दिखलाये
  बच्चों को युं हम समझाये अक्षर सीखो गिनती सीखो कहना सीखो पढना सीखो सुनना सीखो लिखना सीखो सबसे प्यार से रहना सीखो चोरी करना झूठ बोलना बुरी बात है बुरी बात है दादाजी का कहना मानो नानाजी का बुरा मत मानो सब छोटों को प्यार करोतुम कभी नहीं आपस में लडो तुम्
  बच्चो तुम भी बडे बनोगे
  अपने ऊपर गर्व करो गे ।

कहां गये वे खेल खिलौने?

कहां गये वे खेल खिलौने ? समय बदलने के साथ सब कुछ बदल गया।छुपा_छुपाई,आइस-पाइस,किलकिल कांटे,सातटप्पे बाला गेंद का खेल,गिट्टीफोड, चोर् -सिपाही,अटकन-बटकन दही चटाके-वन फूले बंगाले,बाबा बाबा आम दो,बाबा बाबा कहां जारहे गंगा नहाने,गुटके खेलना,इमली के चीयों से चक्खन पे खेलना,जमीन पर आक्रति बना उसमेंगोटी डाल इक्कम दुक्कम खेलना,सहेलियोंकेसाथ रस्सी कूदना,पेड्पर रस्सी डाल झूला झूलना,मां का पुराने कपडों से सुन्दर सी गुडिया बना देनाऔर सहेली के गुड्डे से उसका ब्याह रचाना,मोहल्ले मेंहाथोमेंपेड की टहनी पकड बारात निकालना,गुदिया की शादी मेंढेर सारेझूठ-मूठ के पकवान बनानाआदि-आदि। मुझे तो अपना वह समय आज भी याद है जब होली के मेले मेंमिट्टी के खिलौनों के लिये हमारी पहली फरमायश् होती थी,रंग बिरंगे गुब्बारों पर हमारी ललचाती निगाहें टिकी रहतीथीऔर जब तक वे गुबारे हमारे हाथों की शोभा नही बन जाते थे हम बच्चोका रूठना मटकना बरकरार रहता था।  

पुरानी आदत वश जब मेले में जाकर मैंगुब्बारे और मिट्टी के खिलौने खरीदने लगी,संसथा में बच्चो के लिये कपडे की गुडिया बनाने लगी ,मिट्टी के खिलौने बनबाने लगी तोमुझे पहली टिप्प्णी कुछ इस रूप में मिली क्या इस जमाने में भी पचास सालो को वापिस लाने की कोशिश कर रही हो,समय के साथ कदम मिला कर चलो बाजार में सब कुछ मिलता हैक्यों खुद को और बच्चों को परेशान कर रही हो।मुझे लगता है हम अपने आलस को छुपाने के लिये नये जमाने का तर्क गढ़् लेते हैं


 
आज जब बच्चों के खेल और खिलौनौ की बात आती है तो सारे केसारे विध्वंसात्मक खिलोने हमने उनके हाथ में पकडा दिये है6कहींढिसुम-ढिसुम करती बन्दूके है तो कहीं भयंकर आवाजेंकरती गाडियोंऔर हेलीकोप्टरों के मोडल है।खेल के नाम पर या तो वीडियोगेम है अथवाहाथों में रिमोट लिये कार्टूनों को देखतेऔर एक ही स्थान पर बैठे जादुई प्रभाव में बन्धे बच्चे।शारीरिक व्यायाम के नाम पर हम उन्हें दो कदम भी नहीं चलने देते।क्या यही आधुनिकता है जिसके चलते हम अपने बच्चों को अपंग बना रहे हैं आज हम केवल उसके बौद्धिक विकास में ही अपनी पूरी शक्ति झोंक रहे हैऔर उसे भी एक रिमोट के रूप में तैयार कर रहे रहे है।उन खिलौनों और खेलों से बच्चों का जितना शारीरिक और मानसिक विकास होता था कहां गये वे खेल-खिलौने?

Tuesday, June 2, 2009

बच्चोंको किस भाषामें डांटा जाये।


बच्चों को अपने जीवन काल में इतनी डांट पडती हैकि वे बडों के द्वाराबात-बेबात पर् डांटे जाने को स्वाभाविक प्रक्रिया मांनते हैंऔर कभी बुरा लगने पर भी कमीज की बाहों से अपने आंसू पोछ लेते है अथवा सुबक –सुबक कर रो लेते है।पर क्या कभी हम बडों ने इस बात पर विचार किया हैकि हम अपने क्रोध को मासूम बच्चों पर उतारते है।बच्चॉं की गलती न होने पर भी वे हमारे क्रोध काकारंण बनते हैक्योंकि वे दुधमुहे होते है,क्योंकि उनकी कोइ अदालत नहीं होती,क्योंकि वे बेजुबां होते है,क्योंकि वे अभिभावकों के मोहताज होते है ,क्योंकि वे बच्चे होते हैं,क्योंकि अपने को अभिव्यक्त नहीं कर पाते,क्योंकि उनका कोइ वजूद नहीं होता,क्योंकि वे समर्थ नहीं होते। हम बडे कहे जाने वालेजीव् बच्चों को डांटते समय अपनी भाषा का ध्यान नहीं रख्ते-सुअर,, कुत्ता,गधा,पागल ,बैमान ,चोर ,उचक्का,लफंगा,हाथी की तरह खाता है,लड्की की तरह शरमाता है,लडके होकर रोते हो,तुम तो निरे बुद्धु हो, अकल तो है नही,बांकी तरह बढ रहे हो आदि-आदि।ये तो कुछ मिसाले हैंजिनका प्रयोग बहुतायत से किया जाता है।इसके अतिरिक्त गाली देना तो एक फैशन की तरह बन गया है।साला, साली को तो गाली माना ही नही जाता,बात-बात मे इस शबद को एक तकिया कलाम के रुप में प्रयोग किया जाता है।बिना सोचे समझे कि हमारे द्वारा कहे जाने वाले शब्द बच्चों के शब्द कोश में फीड् हो जाते हैंऔर बच्चे उन शब्दों को कहते समय बिल्कुल भी सजग नहीं होटल कि ह कुछ भी गलत कर रहे हैं। आओ हम प्रतिग्या करेंबच्चों को डाटने से पहले सोचेगे कि किस गलती पर डांटा जा रहा हैऔर हमकिस भाशा का प्रयोग कर रहे हैं।

Friday, May 8, 2009

अपना बचपन याद करें

मुझे भी अपने बचपन में झांकने की याद आ गई! मैं कहानीकार तो नहीं हूँ और नहीं साहित्यकार! मैं तो ठहरा एक गाँव का ग्वाला हाँ वही गाय और भैंस चराने वाला ग्वारिया! हाँ तो बात तब की है जब मैं आठ या नौ साल का रहा हूँगा! रक्षा बंधन का त्यौहार था! मैं भैंस चराने गया था! दोपहर के समय भैंसें पोखर में जा कर बैठ गयीं! पोखर मैं पानी तो ज्यादा नहीं था, लेकिन मेरी ऊँचाई के हिसाब कहीं बहुत ज्यादा था! थोडी भूख भी लगाने लगी थी और ऊपर से घर जा कर पकवान खाने की जल्दी थी!
फिर क्या था आव देखा न ताव घुस लिया पोखर में भैंस के पास तो पंहुंच नहीं पाया लेकिन पानी जरूर सिर से ऊपर हो गया और मैं डूबने लगा! बुडुर बुडुर बुल बुले ऊपर आने लगे! मुझे कुछ पता नहीं, तभी एन मसीहे का हाथ मेरे सिर पर आ गया और मुझे पोखर के बहार निकाला! आज भी मैं उस मसीहे को याद कर के मैं बार बार नमन करने लगता हूँ! और बड़ी अच्छी तरह से अपने जेहन में यह बात उतरता हूँ कि "भगवान की कोई जाति, पांति या धर्म नहीं होता और न ही कोई स्वरुप" ! बस एक आम इन्सान कभी भी किसी के लिए मसीहा, फरिस्ता बन सकता है।

   अवधेश नगाइच 

Tuesday, May 5, 2009

अपना बचपन याद करें


याद आता है मुझे अपना बचपन जब पिताजी के कन्धोंपर बैठ कर मेला देखने जाती थी,पिताजी की पीठ पर बैठ कर यमुना नदी में तैरना सीखती थी।मां परियों की कहानी सुनाकर हमें प्यार से सुलादेती  थीऔर सुबह उठ्ने पर अपने तकिये के नीचे मिठाई देख कर मुझे पूरा विश्वास हो जाता था कि रात को परी मेरे पास जरूर आई होगी।पूरा दिन मैं खुश खुश रहतीऔर रात का इंतजार करती।

वो दिन भी क्या दिन थे जब इतने प्यार से हम बच्चों को पाला जाता था।पिताजी की कम आमदनी मेंभी हमेंवह सब कुछ मिला जो हमने चाहा।सच मैं बहुत भाग्यशाली हुंजो मुझे माता पिता का भरपूर प्यार मिला।

पर आज जब बच्चों को प्यार के लिये तरसते और मांपिता के गालियां सुनते देखते हुंतो मन को बहुत चोट लगती है

\ऐसे सभी बच्चोंको मेरा बहुत बहुत प्यार।मेरे दुनिया मेंसभी बच्चोइं का बहुत बहुत स्वागत ह 

Friday, April 24, 2009

बच्चे मन के सच्चे

कहने को तो ये गाने की एक पंक्ति है पर इसकी सच्चाई उस समय मालूम होती है जब आप किसी बच्चे के साथ अपने को जोड लेते है और उसके मन को समझने का प्रयास करते हैं। ऐसी ही एक घटना मेरे साथ घटी जिसे मएं आपके साथ शेअर करना चाहती हूं।

Saturday, April 11, 2009

मासूम बचपन


मासूम बचपन ,बेचारा बचपन, अभागा बचपन, माता-पिता के प्यार से वंचित बचपन, ,चाय के झूठे प्याले धोता बचपन,भीख मांगता बचपन, बडो की डांट फटकार खाता बचपन ,बस्तो के बोझ से लदा बचपन ,अधिक अंक लाने की होड मे खुद से जूझता 

 बचपन, गलियो मे भटकता अबोध बचपन,माता-पिता के प्यार के स्थान पर बेश कीमती खिलौनो से खेलता बचपन ,बचपन् की कौन सी परिभाषा चुनी है आपने अपने लाडले के लिये? गीत के नाम पर किसी फिल्म का अश्लील गाना और नाच के नाम पर शरीर का बेहूदा 
प्रदर्शन ,आदर्श के नाम पर फिल्मी हीरो –हीरोइन का नाम,संस्कृति के नाम पर पाश्चात्यमूल्यो का पोषण,मॉ –पिता के बदलते संस्करण मोम-डैड ,सिस मे बदलती बहना 
अंकल और आंटी मे बदलते चाचा-चाची,ताऊ-ताइ,मौसा-मौसी,बुआ-फूफा, कजिन मे बदलते ,ममेरे ,ततेरे,फुफेरे,मौसेरे,चचेरे भाई-बहिन|
क्या आपका बच्चा भी इन सब स्थितियों होकर गुजर रहा है तो सावधान होने की जरुरत है।दरअसल ये वे मूल्य हैं जिन्हें हम और आप जाने-अनजाने अपने बच्चोंमें संक्रमित करते रहते हैं।हमारा अपना व्यवहार माता-पिता के रुप में आदर्श नहीं होता ।हम अपनी कथनी और करनी को एक नहीं कर पाते ।उपदेश की भाषा बडी आलंकारिक और आदर्श से युक्त होती है पर हमारा व्यवहार कुछ और ही संकेत करता है।बच्चे जिन्हें हम छोटे और नादान मानकर चलते हैं बडी सूक्ष्मता और ध्यानपूर्वक् माता पिता के व्यवहार का निरीक्षण करते हैं। एक तरह से कहें तो अपने बच्चों को चोरी ,झूठ और फरेब हम ही सिखाते हैं।कभी हम व्यवहारिकता के चलते तो कभी स्वार्थ वश ऐसा करते है पर बच्चा उसी घटना को मिसाल मान लेता है। रिश्तेदारों के आगे हम अपने बच्चे की प्रशंसा करवाने के लिये उसे गीत, कविता ,गिनती ,वर्णमाला,और उसे जो भी नया आता है सुनाने के लिये कहते हैं।यदि बच्चा ऐसा नहीं करता तो डांटडपट कर बाध्य कर देते हैं। सच मानिये बच्चाभी अपना एक मन रखता है जिसे गाहे बगाहे स्वीकृति मिलनी ही चाहिये।बच्चों की मनस्थिति समझ कर ही नाजुक उम्र में उन्हें संस्कारित किया जा सकता है।

Tuesday, March 17, 2009

हम क्या कर सकते हैं

क्या हम इतने स्वाथी हो गये हैं कि अपने हित के अलावा कुछ सोच ही नही सकते?

क्या हमारा दायित्व केवल अपने परिवार के लिये ही है?

क्या उन हजारों बच्चो के लिये हमारी सम्वेदना समाप्त हो गयी है जिंनके ऊपर से माता पिता.का साया उठगया है अथवा जिनके अभिभावक उनके प्रति सजग नहीं हैं?

क्या हम इतने स्वाथी हो गये हैं कि अपने हित के अलावा कुछ सोच ही नही सकते?
क्या हमारा दायित्व केवल अपने परिवार के लिये ही है?
क्या उन हजारों बच्चो के लिये हमारी सम्वेदना समाप्त हो गयी है जिंनके ऊपर से माता पिता.का साया उठगया है अथवा जिनके अभिभावक उनके प्रति सजग नहीं हैं?
क्या जिन्दगी का मकसद केवल और केवल अपना पेट भरना है?
यदि ऐसा नहीं है तो हमें सोचना होगा कि हम क्या   क्या करें  जिससे अपनी यदि आपकी जिन्दगी को नया अर्थ मिल सके। 

यदि आपके पास कोई हुनर है तो उसे दूसरों को सिखायें।
अपने ज्ञान  को दूसरों के साथ बाँटें ।

दूसरों की समस्याओं को हल करने में अपना योगदान दें।
छोटी -छोटी सहायता कर के आप उनका दिल जीत सकते हैं।

आपके पास जो भी अतिरिक्त है उसे तत्काल दूसरों को दे दें।

अपनी आवश्यकताओं को सीमित करे। 

अपने ऊपर विश्वास रखें कि आप जो भी कर रहे हैं वह आपकी द्रष्टि से बिल्कुल ठीक है।








Tuesday, February 24, 2009

अंधेरी दुनिया

शिक्षा बच्चों का पहला अधिकार है लेकिन बहुत दुख का विषय है कि ये बच्चे कम उमर में ही मजदूरी करते है। दरअसल उनके माता-पिता अपनी गरीबी के कारण उनसे मजदूरी कराना चाहते है।ऐसे बच्चो को शिक्षित करना एक पढे-लिखे नागरिक का पहला कर्तव्य है।
हमअपनी-अपनी दुनिया में इतने व्यस्त हैं कि इन छोटी –छोटी बातों पर ध्यान ही नहीं देते। आओ सोचें हम क्या कर सकते हैं?
1.अपनी दुनिया को थोड़ा बड़ा करें।
2.ऐसे बच्चों को इकठ्ठा करें ।
3.उनको पढ़ाना शुरु करें।
4.सबसे पहले सुन्दर वर्ण लिखना सिखाऍ।
5. छोटे-छोटे शब्द लिखना सिखाना जरुरी है।
6. अक्षर ज्ञान के साथ- साथ अंकीय ज्ञान देना भी आवश्यक है ।
7.नैतिक शिक्षा के लिये महापुरुषों से सम्बन्धित कहानिय़ॉ सुनाना आवश्यक है।
8.वैदिक मंत्र और प्रार्थना प्रतिदिन करानी चाहिये।
9. छोटी कविताओं को कंठ्स्थ करा देना चाहिये।
10.शारीरिक व्यायाम के साथ –साथ मांनसिक स्वास्थय के लिये ध्यान कराना पहली शर्त है।