Tuesday, August 4, 2009

बदरंग होते कच्चे धागे

कल राखी है भाई बहिन के पवित्र और प्यारे से बन्धन का प्र तीक राखी ।बहिनें अपने भाई की कलाई सजाने के लिये बाजार से चुन -चुन कर राखी खरीद रही है और भाई भी अपनी बहिनों के लिये हाईटेक गिफ्ट खरीद रहे हैं।इतना ही नहीं धर्म भाई और धर्म बहिनों के मन में भी ढेरों उत्साह हैकर्मवती और हुमायु की पर्म्परा को जीवित जो रखना है।सब कुछ तो ठीक ठाक चल रहा था फिर अचानक समाज में एतना बडा परिवर्तन क्यों आया कि भाई बहिन जैसे पवित्र रिश्ते पर भी कालिख पुत गई बहिनें अपनेसुहाग भी भाई के रूप में ढूढने लगी और भाई शब्द की पवित्रता पाप के घेरे में आगई । हार की जीत कहानी में सुदरशन बाबा भारती से कहलबाते हैं खडग सिंह घोडा तो लेजाओपर इस बात का पता किसी को न लगे अन्यथा लोग गरीवों पर विश्वास करना छोड देंगें
आज समाज का जो पतन हो रहा है आखिर उसका जिम्मेबार कौन है? क्या हमारे अनुशाशन में कोई कमी रह गई है अथवाएडवांस बनने की चाहत में हम अपने सांसक्रतिक मूल्यों को भूलते जा रहे हैं। पता नही यह पतन कहां जाकर गा? सुनने में तो यह भीआरहा है कि पहले भी सब कुछ होता था पर पर्दे के पीछे। नजानेकितने अवैध सम्बन्धों की दुनिया समानांतर चलती रहती ठीक और थोपे गये सम्बन्धों को भी बेमन से ही सही निभा दिया जाता था। शायद तब सच का सामना करने की इतनी ताकत् नहीं रही होगी।सांप भी मर जाता था और लाठी भी नहीं टूटती थी। समाज की व्यवस्था भी बनी रहती और उन सम्बन्धों का निर्वाह भी चोरी छिपे होजाता था। सवाल यह नहीं कि ये सब बहुत कम होता था। मेरा मानना है गलत तो गलत होता है चाहे वह पर्दे के पीछे होअथवा खुले में। क्या ये सम्वन्ध अचानक वट् व्रक्ष बन जाते है अथवा छोटी- मोटी मुलाकातोंको हम नजर अन्दाज कर देते हैं ।ये भी हो सकता हैकि हम अपने वार्ड पर आंख मूंद कर भरोसा कर बैठ ते है हम उन्हें इतना बडा मान लेते हैकि वे सब कुछ सही कर रहे हैं।क्या प्रेम अर सच्छा प्रेम केवलपाक र ही पूरा किया जा सकता है इसके अलावा और कोईरास्ता शेश नहीं बचता। नये जमाने ने हमेंक्या कुछ दिया यह तो गणना का विशय है पर इतना तो निश्चित है कि हम अपनी ही आंखों मेंइतना गिर गये है कि इन सम्वन्धों को अनदेखा कर छोड देते है और बहुत से बहुत अपने को चुपा लेते है क्योंकि जानते है कि नये जमाने में वही सच होता है जिसे हम सच मान चुके होते। पर आंख बन्द कर लेने से अथवा अपने को छुपालेने से सम्स्या का समाधान तो नहीं हो जाता।है

1 comment:

  1. जानकी जेठवानीAugust 6, 2009 at 5:06 PM

    परंपरा से हटकर यथार्थ को देखकर चलना सीख लिया तो सम्झो जीना सीख लिया।

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