Sunday, June 20, 2010

बहुत याद आते है पिताजी

पिता केवल जनक ही नही हुआ करते
हुआ करते है हमारा सम्बल
हमारे सन्स्कार
हमारी यादे
और सबसे अधिक हमारी शक्ति ।
बच्पन अप्ना रूप तभी
ले पाता है जब पिता
नन्ही अगुलियो को थामे
जीवन की पथरीली डगर
पर चलना सिखाता है
डगमगाते े कदमो को
स्थिरता देता है
और नीर-छीर विवेकी
बनाता है।
मा महिमा मंडित होजाती है
और पिता अपने पुरुष्त्व के
खोल मे सिला बधा
न तो बेटी की विदाई पर
खुल कर रो पाता है
और न अपने स्नेह का
इजहार ही कर् पाता है
पर इससे क्या
पिता छोटे
े तो नही हो जाते

2 comments:

  1. बिलकुल सत्य कहा है आपने ! पिता का प्यार सदैव प्रदर्शन से परहेज़ करता है लेकिन उसकी गहराई और गंभीरता का पता उस दिन चलता है जब हमें हमारे संकट की घड़ी से उबारने में उन्हें कठोर निर्णय लेने में एक पल का भी समय नहीं लगता ! पितृ दिवस पर आपकी यह श्रद्धांजलि विमोहित कर गयी ! आभार !

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