Thursday, March 18, 2010

अपना दीपक स्वयं बनो|

चल पड़े

एक से दो होने

मानो वह अकेले

और बिलकुल अकेले थे|

अखबारों में दिए इश्तहार

और डाल दिया बायोडेटा 

मेरिज ब्यूरो पर|

और जब खोज हुई पूरी  

मिला दूसरासाथी

जिसे हमसफ़र 

कहने का चलन था|

अचानक खुशियों की हुई बारिश

झमझमा झम |

सफर अभी एक चौथाई भी 

तय नहीं हो पाया 

कि

घिर आये बादल

बरसने लगे मेघ,चमकी बिजली 

और ओले भी गिरे टपटपाटप|

हमसफ़र कहे जाने वालेजीव

के बदले तेवर

टेड़ी हुई भ्रकुटी 

और चुपचाप खिसक लिए 

नए आशियाँ की तलाश् में|

तब जाकर राज खुला 

अरे वह तो बालू की दीवार था

क्या सहारा दे पाता?

जिसमें खुद खड़े रहने

का साहस नहीं |

तब याद आया

बुद्ध का वचन

अप्प दीपो भव

अपना दीपक स्वयं बनो|

गलत सहारा मत चुनो|

5 comments:

  1. अपना दीपक स्वयं बनो|

    गलत सहारा मत चुनो
    सुन्दर सन्देश। धन्यवाद्

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  2. आज के यथार्थ की बेबाक बयानी ! आपने जो लिखा है वह शत प्रतिशत सच है ! अपने जीवन को यदि आलोकित करना है तो अपना दीपक स्वयं ही बनना पड़ेगा ! बहुत खूब !

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  3. बिल्कुल ठीक।

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